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Friday, October 14, 2016

संक्रमण भगाएँ, स्वास्थ्य लाएँ

आपने मृत  पशु  अवश्य  देखा  होगा।  उसके  देहांत  के    बाद  अविलम्ब  दुर्गंध नहीं  फैलता है।  शव  जैसे-जैसे  सड़ता  है , हवा  में  बदबू  फैलने  लगती  है।  धीरे-धीरे   शव  सूखता  जाता है, एक समय ऐसा भी आता है, जब  शव  सूखकर  समाप्त  हो  जाता है। साथ  ही दुर्गंध भी समाप्त  हो जाता  है। 
 यक्ष -प्रश्न  यह है कि  शव  बिना  हटाये  कहाँ  चला  जाता  है। उसके बहुत  छोटे-छोटे  टुकड़े  अदृश्य बैक्टीरिया  में  परिणत होकर हवा  में  तैरते-तैरते समाप्त  हो  जाते  हैं। उधर  से  गुजरने  वालों  के  सम्पूर्ण  शरीर  को अदृश्य  बैक्टीरिया  दुष्प्रभावित करते रहते  हैं। 

अतः बदबूदार स्थानों पर बदबू होने का मुख्य कारण हवा में तैरते बैक्टीरिया होते हैं। अतः जब हम बदबूदार स्थानों पर जाते हैं तो हमारा पूरा शरीर हवा में तैरते इन बैक्टिरिया के बीच में चला जाता हैं। यह एक तरह से प्रदूषित हवा में डूबकी लगाने जैसा होता है। अतः यथासम्भव बदबूदार स्थानों से दूर रहने में ही भलाई है। यथासम्भव  समाज में या घर में भी दुर्गंध न पैदा होने दें।

मेरे मित्र का छः साल पहले किडनी प्रत्यर्पण हुआ। वे आज भी पूर्णतः स्वस्थ हैं। उन्होंने बताया कि किडनी प्रत्यर्पण के बाद चिकित्सक ने उन्हें संक्रमण से बचाव के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए।
1.सत्तर से अस्सी प्रतिशत मामलों में संक्रमण मल-मूत्र त्याग करते समय होता है। अतः वाश रूम हमेशा साफ-सुथरा रखें।


2. यात्रा करते समय फिनाइल अपने साथ रखें और सार्वजानिक शौचालयों में मल-मूत्र त्याग करने के पहले उसमें पानी मिलाकर शौचालय में डाल दें।


 रेल यात्रा के समय फेनाइल रखने का प्रयोग एक नयी क्रांति लाएगा।
 मेरे एक अन्य मित्र प्रमोद बाबू को को गन्दे शौचालय में मूत्र-त्याग के बाद संक्रमण हो गया था, बेचारे को अंततः पी.जी.आई. लखनऊ में  इलाज  कराना  पड़ा।  

Tuesday, October 11, 2016

याददाश्त देती है अक्सर धोखा

दुःशासन द्वारा चिरहरण के असफल प्रयास के पश्चात द्रौपदी ने प्रतिज्ञा किया कि  जब तक उसके  रुधिर से अपने बाल न धोएगी, तबतक  उन्हें  खुला रखेगी। अनिश्चित काल तक बाल खुले रखे बिना भी द्रौपदी यह कसम  खा सकती थी । यह  घोर अपमान पांडव भी भूलने वाले नहीं थे, फिर भी द्रौपदी अपने बाल खुले रखकर उन्हें हर पल  उस अपमान की याद दिलाती रहती थी, क्योंकि ईश्वर ने हमें क्षीण स्मरण-शक्ति दी है।  
कुछ  दिनों  पहले  मैंने  'अलकेमिस्ट ' तीसरी  बार  पढ़ी , लेकिन  लग  रहा  था , जैसे  कई  प्रसंग  बिलकुल  नए  हैं ?  बिरले  ही  कोई ठीक-ठीक  यह बता  पायेगा  कि  पिछले  सप्ताह  उन्होंने  किस  रंग की शर्ट -पैंट  पहनी  थी।  मेरे  एक मित्र ने  तो  यह  चुनौती  दे दी  कि  आप  यह  भी  नहीं  बता सकते  कि  दो  घण्टे  पहले  आप  किस  विचार  से  व्यथित  या  प्रसन्न  हो रहे  थे ?

एक बार मुझे २८ सितम्बर तक क्रेडिट-कार्ड के 6084 रूपये भरने थे। मैनें न तो इसे  To Do लिस्ट में लिखा और न ही कैलेंडर में  जोड़ा , क्योंकि मैं मानकर चल रहा था कि क्रेडिट-कार्ड का बकाया भूगतान करना, मैं भूल ही नहीं सकता। संयोगवश मैं बैंक की अर्धवार्षिक लेखाबंदी में व्यस्त था; इसी  बीच  28 सितम्बर  दबे  पाँव आया और चला गया। क्रेडिट-कार्ड वालों ने अच्छा-खासा जुर्माना ठोक दिया। मुझे 6084 रुपयों के बदले 6617 रूपये भरने  पड़े।  
अतः Repetition और Association से याददाश्त को सहायता करने के साथ-साथ  आप उन चीजों को व्यवस्थित ढंग से लिख भी लें। 
क्रेडिट-कार्ड कम्पनियाँ 50 दिनों तक ब्याज-मुक्त ऋण देकर भी मुनाफे में रहती हैं, शायद उन्हें मेरे जैसे भुलक्कड़ भारी संख्या में मिल जाते होंगे। 
मुझसे अनेक ग्राहक मिलते हैं, जिनकी लॉकर की चाभी या फिक्स्ड-डिपोजिट की रसीद  खो गयी रहती है, अगर किसी  विशेष  सामान को एक खास  स्थान  पर  रखने की आदत बनायें और परिवार के किसी जिम्मेदार सदस्य को भी यह जानकारी दे दें तो यह समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है और  बैंकों  में  बिना  किसी  दावेदार  के  पड़ी  अरबों  रुपयों  की  राशि में  भी  भारी  कमी  होगी। मैंने  तो लाखों  के  गहने  वाले  अनेक दावेदार विहीन लॉकर भी  देखे  हैं।  

Sunday, October 9, 2016

अकल तो चाहिए, नकल को भी

एक अस्पताल के बाहर घोंचू लाल  की कफ़न की दुकान थी।  दुकान काफी दिनों से मंदी चल रही थी। दीपावली का त्यौहार नजदीक था। घोंचू लाल अपने सुपुत्र पोंचू लाल के साथ चिंतित रहते थे कि दिवाली का पर्व बिना आमदनी के कैसे मनाएंगे ? 

इसी बीच धन-तेरस आ धमका।  घोंचू लाल ने अपने सुपुत्र को दस रूपये दिए और बोले," बेटा, कम से कम एक चम्मच ही खरीदकर सगुण कर लो। पोंचू लाल बाजार गए।  वहाँ  रात  में  भी  दिन  जैसा  माहौल था।  पूरा  बाजार  रौशनी  से  जगमगा  रहा  था।  बर्तनों और गहनों की एक से एक दुकानें सजी थी। एक दुकान पर भारी भीड़ लगी थी। वहां एक बड़ा बर्तन खरीदने पर छोटा बर्तन मुफ्त मिल रहा था। पोंचू लाल ने भी एक बड़े चम्मच के साथ एक छोटा चम्मच लिया और ख़ुशी-ख़ुशी लौट आये। 

अपनी दुकान पर पहुंचकर उन्होंने उपरोक्त स्कीम अपने पिताश्री को बताई।  बाप-बेटे को यह आईडिया हिट लगा। अगले दिन वे दोनों भी अपनी दुकान पर जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, " सेल-सेल ,महासेल !एक सयाने का के कफ़न के साथ बच्चे का कफ़न मुफ्त ले लो। "

देखते-देखते घोंचू और पोंचू की दुकान के चारों तरफ भीड़ लग गई। जिसके हाथ में जो भी आया, उसी से घोंचू और पोंचू को धोने लगा। जिनके  हाथ  में कुछ  नहीं  था , वे लप्पड़-झप्पड़  से  ही  काम  चला रहे थे। बाप-बेटे गिरते-पड़ते घर भागे। 

एक बात उन्हें आज तक समझ में नहीं आई कि जो स्कीम बर्तन-दुकान पर हिट थी, वही स्कीम  कफ़न - दुकान पर कैसे पिट गई?

अगर आपकी समझ में आये तो उन्हें जरूर बता दीजिएगे। 

Saturday, October 8, 2016

जिधर देखो उधर ही अवसर

 मैं खुद से जो सवाल हर दिन पूछता हूँ,क्या मैं वो सबसे ज़रूरी काम कर रहा हूँ जो मैं कर सकता हूँ?

             --- मार्क ज़ुकेरबर्ग



एक ब्राह्मण देवता एक सम्पन्न  गाँव में रहते थे। उनके पास एक काले रंग की घोड़ी थी जिसपर  वे जान छिड़कते  थे और उसपर ही सवार होकर जजमानों के यहाँ जाते थे। एक दिन वे घोड़ी लेकर  पूरब की ओर निकले। उसका मन उस दिन आराम करने का था। अतः वह बेमन से धीरे-धीरे चल रही थी। पंडित जी को गुस्सा आया और उन्होंने घोड़ी को जोर से चाबुक मारा। घोड़ी जोर से हिनहिनाई और पूरब के बदले पश्चिम की ओर दौड़ने लगी। पण्डित जी जोर से चिल्लाये ," कोई बात नइखे ससुरो, उधरो  दो-चार जजमान बा"

आशावादी और उत्साही लोग कहते हैं,"रुपया आसमान में उड़ रहा हैं , उसे देखने के लिए प्रशिक्षित आँखें  चाहिए और पकड़ने के लिए निपुण हाथ चाहिए। "

एक मूर्तिकार  ने अवसर की प्रतिमा बनाई थी , जिसके सिर के आगे बाल थे और पीछे गंजा था, अतः अवसर को वही पकड़ सकता है, जो उसके आने के पहले पूरी तरह तैयार रहता है। 

मार्क जुकरबर्ग ने  कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर में बचपन से प्रशिक्षण और रूचि लिया। 4 फरवरी, 2004 को उन्होंने हार्वर्ड के अपने डॉरमिटरी से फेसबुक लॉंच किया और आज  संसार के चौथे सबसे अमीर आदमी हैं।  

Wednesday, October 5, 2016

परेशानी तेरा नाम ज़िंदगानी

कभी  किसी को मुकम्मिल जहाँ नहीं मिलता 
कहीं जमीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता। 
                                            निदा फाज़ली 

एक बार मैं अति परेशान था। मेरा एक मित्र मुझे  व्यथित देखकर बोला, "अभी-अभी मैं एक व्यक्ति से मिलकर आ रहा हूँ, वह सभी परेशानियों, चिंताओं  और तनावों से सर्वथा मुक्त है।  आओ, मैं तुझे उससे मिलवाता हूँ।" वह मेरा हाथ पकड़कर दरवाजे पर ले आया।  मैंने देखा, "एक व्यक्ति चार लोगों के कन्धे पर लेटकर मजे में जा रहा था और उसके आगे-पीछे चल रहे लोग पूरी श्रद्धा के साथ 'राम नाम सत्य है' का नारा लगा रहे थे।" 

   मैनें अपने मित्र को मीठी झिड़की दी ," अरे पागल , वह तो मृत है।" मेरा मित्र शरारत के साथ मुस्कराया, " हाँ, वह मुर्दा है और मुर्दा ही तो सभी परेशानियों से सर्वथा मुक्त होता है, ज़िन्दों के पास तो परेशानियाँ आती ही रहती हैं। यह दर्शन सुनकर मैं अवाक् रह गया और ईश्वर को धन्यवाद देने लगा, क्योंकि मैं जिन्दा था, परिणामस्वरूप परेशानियों से दो-चार हो रहा था। 

जिस तरह गुलाब के साथ कांटे होते हैं और कंप्यूटर के साथ वायरस आते हैं, उसी तरह जीवन में प्रसन्न्ताओं के साथ परेशानियाँ भी आती हैँ। ईश्वर ने खुशियाँ भी दी  हैं और उन्हीने परेशानियाँ भी दी हैं।  साथ ही सभी समस्याओं का समाधान भी दिया है। 

आप अपनी परेशानी एक कागज पर स्पष्ट  लिख लेंगे तो उसका समाधान खोजने में मदद मिलेगी। घनिष्ठ मित्रों और साथियों के साथ विचार-विमर्श भी समस्या-समाधान में सहायक होता है। 

अगर आपको सारे प्रयास करने के बाद भी किसी समस्या का समाधान नहीं मिले तो निम्नलिखित पंक्तियाँ श्रद्धापूर्वक बार-बार दोहराएँ। आपको अवश्य ही सही रास्ता नजर आने लगेगा। 

For every ailment under the sun, there is a remedy, or there is none;
If there is one try to find it if there is none never mind it.

Sunday, October 2, 2016

कल्पना में कंजूसी क्यों ?

एक बार एक व्यक्ति दायें हाथ में रोटी लेकर बायीं हथेली में सटाकर खा रहा था। उसके साथी को यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ। साथी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा," भाई, तेरी बाँयी हथेली खाली है, फिर तू बार-बार  रोटी बायीं हथेली में सटाकर क्यों खा रहे हो ? उस व्यक्ति ने बड़ा दुःखद उत्तर दिया," मैं कल्पना कर रहा हूँ कि मेरी बायीं हथेली में नमक है और मैं नमक के साथ रोटी खा रहा हूँ। " उसके साथी को बड़ा सदमा लगा, साथी ने माथा ठोकते हुए कहा," मुर्ख! अगर तुझे कल्पना ही करनी है तो कल्पना कर कि तेरी बायीं हथेली पर मलाई है और तू मलाई-रोटी खा रहा है। 
अगर परिवार का कोई भी व्यक्ति घर आने में देर करता था तो माँ घबराने लगती थी और उनके मन में बुरे ख्याल आने लगते थे। एक बार पिताजी देरी से आये , माँ  घबराई हुई थी ; उनके  मन में  भयानक  विचार  आ  रहे थे जब कि पिताजी होली की खरीददारी करने में व्यस्त थे। 
मिथिला  में  अनेक श्रद्धालुओं  की  मान्यता  है  कि  इच्छा  देवी  हर  पल  विचरण  करती  रहती  हैं , वे  जिधर  भी  जाती  हैं , लोगों  की  इच्छाएं  पूरी  कर  देती  हैं।  अतः जो जैसा  सोचता और  बोलता  है , वैसा  ही  पाता  है।  प्रसिद्ध लोकप्रिय कहावत  "मंशे  फल  नियते  बरक्कत " भी  इस  धारणा  की  पुष्टि  करती  है। 

अत जब कल्पना ही करनी है तो अच्छी कल्पनाएं करें, आप जैसी कल्पना करेंगे, वैसा ही परिणाम आपको मिलेगा क्योंकि हर पल अपना दुःख रोने वालों के पास दुखों का पहाड़ आता हैं और सकारात्मक सोच रखने वालों और सकारत्मक बातें करने वालों के जीवन में अच्छी बातें होती रहती हैँ। 
अगर आपको मेरी बात पर विश्वास नहीँ हो तो अपने कार्यालय, परिवार या मुहल्ले में  दोनों  प्रकार  के  पांच या दस लोगों की सूची बनाकर आप खुद परख सकते हैं।