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Monday, August 28, 2017

बचपन के दिन क्यों सुहाने होते हैं?

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बचपन के दिन क्यों सुहाने होते हैं और हर ख़ुशी हर गम से बेगाने होते हैं, क्योंकि बच्चे प्रत्येक परिस्थिति में आनंद उठाना जानते हैं। 

बच्चों में भूलने और क्षमा करने की जबरदस्त क्षमता होती है। आप किसी बच्चे को एक चाँटा दे भी देंगे तो थोड़ी देर रोकर वह फिर आपके साथ खेलने लगेगा मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। 

एक बालक कागज की नाव पाकर चहकने लगता है, जबकि बड़े एक असली जहाज पाने के बाद  दूसरे जहाज  के लिए बेचैन हो जाते हैं। 

बच्चे हमेशा वर्तमान में जीते हैं, जबकि बड़े भूतकाल की गलतियों और भविष्य की आशंकाओं के भारी बोझ से दबकर कराहते रहते हैं। 

आइये कुछ पलों के लिए अपनी समस्याओं को भूलकर इस  नाचती प्यारी गुड़िया के साथ अपने बचपन में लौट जाएँ। 

Sunday, August 27, 2017

अपना मस्तक ऊँचा रखें




   आप अपने व्यक्तित्व को दो प्रकार से  निखार सकते हैं।
1. अपने कार्यकलापों को बदल दें।
  
2. अपने विचारों को बदल दें। 

एक विश्वप्रसिद्ध कहावत है," एक सोच रोपें एक कार्य उपजेगा; एक कार्य रोपें, एक आदत पैदा होगी; एक आदत रोपें, एक चरित्र पायें और एक चरित्र रोपकर अपना भाग्य काट लें।

लेकिन, सोचने की महीन प्रक्रिया पर नियंत्रण रख पाना अत्यंत कठिन होता है। अतः बुद्धिमानगण अच्छी पुस्तकें पढ़ने और सकारात्मक लोगों के संग रहने की सलाह देते हैं। लेकिन, सही सोच वाले लोगों को विनाशकारी विचारों से रक्षा करने के लिए हम हर पल अपने पास नहीं रख सकते हैं।

नकारत्मक सोच जब हावी होते हैं तो हमारा मस्तक नीचे झुक जाता है।
अतः नकारात्मक विचारों के हमले को रोकने के लिए हमेशा सीना ताने रहें और मुस्कराते हुए मस्तक ऊँचा रखें।

मुस्कराहटयुक्त ऊँचा मस्तक न सिर्फ आपके अंग-विन्यास और आपके स्वास्थ्य को ठीक रखता है बल्कि  
अवसादग्रस्त विचारों को भी रोक देता है।

आपका ऊँचा मस्तक अबसेंटमिन्डेडनेस को हावी नहीं होने देता है।
आपका ऊँचा मस्तक आपको सकारात्मक विचारों से सराबोर रखता है।

 सकारात्मक विचारों को अनुकरणीय कार्य-कलाप में परिणत कर देने वालों का संसार अत्यंत सम्मान करता है।




Saturday, August 26, 2017

अलविदा अवसाद


हे  प्रभु , मुझे  धैर्य  दीजिये ताकि  मैं  उन  चीजों  को स्वीकार  कर  लूँ , जिन्हें  मैं  नहीं बदल  सकता हूँ ; मुझे  शक्ति  दीजिये ताकि जिन्हें  मैं बदल सकता  हूँ , उन्हें बदल  दूँ  और  मुझे  सद्बुद्धि  दीजिये  ताकि  मैं दोनों  में  अंतर्  समझ  सकूँ। 


अवसाद आस्तीन का साँप होता है। यह कब डँस लेगा , कोई नहीं जानता है। अनेक बार तो यह डँस भी लेता है और शिकार को पता भी नहीं चलता है। इसका शिकार तड़प-तड़प कर प्राण त्याग देता है। यह खुंखार शैतान आपको अपने कब्ज़े में ले, उसके पहले ही इसे पटक -पटक  कर  मार  डालें। 

लचकने वाले व्यायाम, तेज रफ्तार टहलना और प्रेरणादायक /धार्मिक साहित्य का पठन-पाठन  अवसाद को पैदा लेने से पहले ही काफी  हद तक नष्ट कर देते हैं। 
 आस्तिक इस  खतरनाक आधि के शिकार नहीं होते हैं, क्योंकि जो भी घटित होता है, उसे ईश्वर की इच्छा मानकर वे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।

भूतकाल के सुखद क्षणों के बारे में चर्चा करने से और उन्हें पुनः जीने से अवसाद दूर रहता है। उन सभी वस्तुओं से  भी दूर रहिये, जो किसी दुर्घटना की याद दिलाकर आपको दुखी बनाते हैं।
पूरी श्रद्धा से निम्नलिखित मुहावरों/श्लोकों को दुहराने से अवसाद आपको प्रभावित नहीं कर पायेगा। 

1. कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचना।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि। 

अर्थात   कर्म करना हमारा अधिकार है, फल देना ईश्वर का अधिकार है और ईश्वर जो भी फल देंगे, उसे हम सहर्ष स्वीकार करेंगे और भविष्य में भी पूरी तन्मयता से कर्म करते रहेंगे।
2 . बीती ताहि बिसारिये, आगे की सुधि लीजिये। 
3. हम सुधरेंगे, सँसार सुधरेगा ; वर्तमान साधेंगे, ब्रह्माण्ड सधेगा। 

जिम रॉन ने कहा है," जो आपके पास है, उससे खुश रहिये और जो चाहते हैं उसके लिए अनवरत प्रयत्नरत रहिये। "
उपरोक्त का आप जितना ज्यादा अभ्यास करेंगे, उतनी ही गहराई से ये बातें आपके अवचेतन में पैठ जायेंगी। 

यदि सारे उपायों के बावजूद किसी को अवसाद घेर ले तो वह अपने मित्रों और निकट संबंधियों से निस्संकोच मशविरा करे क्योंकि शत्रु पहचाने जाने के बाद  कम खतरनाक रह जाता है। अवसाद ज्यादा गहरा और खतरनाक हो तो चिकित्स्क से अवश्य परामर्श लें। अवसाद का शत-प्रतिशत ईलाज होता है, वशर्ते कि इसे शीघ्र पहचान कर इस पर तत्क्षण हमला कर दिया जाये। 
अवसाद एक  गंभीर बीमारी है, इसके शिकार के साथ पूरी सहानुभूति रखें और उसकी भावनाओं को समझने की पूरी कोशिश करें। 
अवसादग्रस्त व्यक्ति मुफ्त  गैर चिकित्सीय परामर्श हेतु मुझे winner19000@gmail.com पर लिख सकते हैं।  यह परामर्श बिना किसी शुल्क और जिम्मेवारी के दी जाएगी। 

अब  परिवार के सदस्यों के साथ अपने  जीवन  की  सबसे  सुखद  पारिवारिक घटना  याद  करें  और  उसका  वर्णन  ज्यादा से  ज्यादा  शब्दों  में  करें।  याद  करें  आपके  साथ  कौन  लोग थे? क्या बातें  हो रही  थीं ? भोजन  में  क्या-क्या  पड़ोसा  गया था ? क्या गाने-बजाने  का भी  कार्यक्रम  था ? अब  इन सुखद  यादों  को  अपने  मित्रों  से साझा  करें  या  उन्हें  कोई अच्छा  चुटकुला  सुनाएँ।  मुझे  पूरा  विश्वास है कि आप खुद अंतर  महसूस करने  लगेंगे। 





Saturday, August 12, 2017

हमारे रंगीन चश्मे


'एथेंस का सत्यार्थी' के नायक ने जिद करके नँगा सत्य देखने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप, उसकी आँखें चौन्धिया गयीं और वह अंधा हो गया।

सच पूछिए तो अपने बारे में नग्न सत्य हम भी नहीं बर्दाश्त कर पाते हैं। अतः अपनी आंखों पर रंगीन चश्मे लगा लेते हैं।

अमिताभ बच्चन की सुप्रसिद्ध फ़िल्म शराबी याद कीजिये। शराब की अपनी बुरी लत को तर्कसंगत बनाने के लिए एक गाने में उन्होंने सारे संसार को नशे में धुत बता दिया।

प्रत्येक व्यक्ति अपनी आंखों के सामने पाक-साफ दिखना चाहता है। मसलन यदि मैं कामचोर हूँ तो कम से कम अपनी नज़रों के सामने गिरना नहीं चाहूँगा। अतः मुझे एक रंगीन चश्मा पहनना होगा, जिस चश्मे से सारा विश्व कामचोर दिखेगा। लेकिन बात इतने पर समाप्त नहीं होती है। मुझे अपनी अदालत में दूसरों को कामचोर साबित करके दिखाना पड़ेगा, ताकि मैं अपनी कामचोरी को आम इंसानी कमजोरी मानकर तर्कसंगत साबित कर सकूँ।
यहीं से सारे झगड़ों की शुरुआत होती है। मैं अपने अधीनस्थों पर कामचोरी का इल्जाम लगाता हूँ, चाहे वे कितनी ही तन्मयता या अतन्मयता के साथ अपना कार्य कर रहे हों। बदले में वे भी मेरा प्रतिरोध प्रारम्भ कर देते हैं। फिर गुट बनते हैं। लोग एक दूसरे को नीचे दिखाने के लिये पर्यत्न-रत हो जाते हैं और अपने दिन की चैन और रात की नींद हराम कर लेते हैं।

परस्पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच टीम-भावना की बलि चढ़ाई जाती है और परिवार, समाज और संस्थाएं इसका खामियाजा भुगतती हैं।
टीम-भावना के समाप्त होने के कारण हम निर्रथक झगड़ों में फंस के रह जाते हैं। परिणामस्वरूप, हम मनोवांछित सफलताएँ नहीं प्राप्त कर पाते हैं और जीवन के हमारे बहुत सारे अरमान अधूरे रह जाते हैं।

आखिर इस गम्भीर बीमारी का क्या इलाज हो सकता है?



Saturday, August 5, 2017

अच्छा आदमी क्यों बनें ?


नोबेल पुरस्कार विजेता श्री कैलास सत्यार्थी

क्यों गाँधी, टॉलस्टॉय,और लिंकन के नाम अभी भी आदर और श्रद्धा के साथ लिए जाते हैं? क्यों हिटलर, मुसोलिनी और दुर्योधन से लोग आज भी घृणा करते हैं?
क्यों सीता और राम की पूजा की जाती है जबकि रावण और मेघनाद के पुतले जलाये जाते हैं।
क्यों अधिकांश अपराधियों की अकाल मृत्यु होती है, जब कि  अच्छे लोग दीर्घायु होते हैं?
क्यों टाटा, बाटा और रिलायंस दिन-दूनी  रात चौगुनी गति से बढ़ते जाते हैं, जबकि अनेक ठग कम्पनियाँ प्रति वर्ष खुलती और बंद हो जाती हैं?
उपरोक्त सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है, अच्छाई की आज भी अर्चना और पूजा की जाती है। "काठ की हांड़ी चढ़ै न दूजे बार" एक शाश्वत सच्चाई है। 
आप अपने शहर और मुहल्ले में भी पायेंगे कि अच्छे लोग शांति और प्रतिष्ठा के साथ जीवन-यापन कर रहे हैं, जबकि चोर-उच्चके नींद में भी दहशत के साथ रहते हैं और असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं। 
अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है की अच्छा मनुष्य कैसे बनें और मान-सम्मान के साथ कैसे आत्मसंतुष्ट जीवनयापन करें और कर्म करने की क्षमता-वर्धन कर कैसे अपार सफलताएँ  पायें?
 महापुरुषों के जीवन-अध्ययन करने पर मैनें अच्छे व्यक्तियों में निम्नलिखित 3 महत्वपूर्ण गुण पाये। 

1. अपने साथ जुड़े व्यक्तियों, मित्रों और पारिवारिक सदस्यों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचायें। मुकेश अम्बानी जैसे लोग जो कम से कम मूल्य पर ज्यादा से ज्यादा लाभ दे रहे हैं, वे दिन दूनी रात चौगुनी गति से प्रगति कर रहे हैं।

2. अपने मित्रों, पारिवारिक सदस्यों और अपने-आप की यथा-सम्भव सहायता करें। यथाशक्ति अन्य जरुरतमन्दों की भी सहायता करें। आपकी अपनी सहायता आवश्यक है क्योंकि नियमित आहार, व्यायाम और उचीत जीवन-शैली अपनाकर आप स्वस्थ रहेंगे, तभी दूसरोँ की सहायता कर पायेंगे।
यदि आप कोई सहायता करने की स्थिति में नहीं हों तो अपनी उपस्थिति से उन्हें खुश और संतुष्ट रखने का प्रयास करें।

3. . ऐसा कोई कार्य न करें, जिससे किसी निर्दोष व्यक्ति या खुद को कोई कष्ट हो। आपकी आत्मा और आपका शरीर भी ईश्वर की अमानत है, अतः अपने साथ भी पूरा न्याय करें।


 अपराधी को सजा देने का कार्य सक्षम व्यक्ति पर छोड़ दें। 

 सारे प्रबंधन की पुस्तकों और व्यक्तित्व विकास  पुस्तकों में इन्हीं बिंदुओं को लागू करने के तरीके दिए गये हैं। जैसे:-  यह शिक्षा दी जाती है कि दूसरों की बात बीच में नहीं काटें। यदि आप बिंदु संख्या 3 का अभ्यास करेंगे तो कभी किसी की बात को बीच में नहीं काटेंगे क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें बुरा लगेगा। इस तरह कोई भी नैतिक शिक्षा इन तीन बिंदुओं के अंदर आ जाती है। दूसरों की बातें ध्यानपूर्वक सुनकर आप उनकी सहायता करेंगे या  उन्हें खुश और संतुष्ट करेंगे तो बिंदु संख्या 2 का अभ्यास कर लेंगे। यदि आप अच्छी ग्राहक सेवा देते हैं तो यह बिंदु संख्या 1 के अंतर्गत आ जाता है। सिर्फ ग्राहक से मुस्कराकर भी बात कर लेंगे तो बिंदु संख्या 2 का अभ्यास करते हुए अपने व्यापर की भी वृद्धि करेंगे। 
उपरोक्त तीन बिंदुओं का अभ्यास अधिकांश महापुरुष करते आ रहे हैं। इन तीन बिंदुओं का सतत अभ्यास अवश्य ही वांछित फल देगा और आपकी कार्य करने की क्षमता जितनी ज्यादा होगी, उतनी ही अपार सफलता आपके कदमों को चूमेगी।  जैसे श्री कैलास सत्यार्थी ने  1980 से लगातार बाल-मजदूरी उन्मूलन के लिए कार्य किया और 144 देशों में 83000 बच्चों को उनके अधिकार दिलवाये। परिणामस्वरूप उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार 2014 से सम्मानित किया गया।

राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा है :-

सहनशीलता, क्षमा, दया को 
तभी पूजता जग है 
बल का दर्प चमकता उसके 
पीछे जब जगमग है। 
महान और शक्तिशाली व्यक्तियों की क्षमाशीलता या क्षमायाचना की अवश्य ही चहुंमुखी प्रशंसा होती है, लेकिन "रंगभूमि" के सूरदास की तरह निर्बल व्यक्ति भी इन गुणों को अपनाकर महान बन जाते हैं। 

Sunday, July 23, 2017

THE TREACHEROUS SILENT ISCHEMIA


My college days friend was hospitalized due to angina pain. He was put into ICU for 24 hours and shifted to a hospital room after improvement. The attendant of the hospital checked his blood pressure which was quite okay. My friend asked for a cup of tea. His son in law went downstairs and returned with a cup of tea within ten minutes. The poor son in law became dumb founded to see the lifeless body of Mishra jee.The doctor diagnosed that the cause of death was a severe heart attack without any chest pain.
 I have heard about many acquaintances who went to sleep hail and hearty but left for heavenly abode in the sleep itself. Later on, the Doctor diagnosed that they suffered a severe but painless heart attack.
My Doctor friend Shri B.D.Mishra told that these heart-attacks were caused by the silent cardiac ischemia. This is a condition when the victim does not feel pain when the flow of oxygen-rich blood is restricted to the heart due to blockage of veins or due to any other reason.
The diabetics are especially prone to the silent ischemia. However, this disease may also be caused by the following reasons.
1. Hypertension.
2. History of a previous heart attack. 
3. Smoking
4. Drinking Liquor
5. High Cholesterol or bad cholesterol. 
6. Obesity


Although, symptoms of the silent ischemia may not always be obvious and regular health check up of the susceptible persons appears to be the only solution to detect the devil before it kills, yet one must become extra cautious when following symptoms appear without any apparent reason and must consult the doctor immediately.

1. Shortness of breath after physical activity or after going upstairs.
2. Extreme fatigue
3. Too much perspiration.
4. A fast heart beat
5. Nausea and/or vomiting.
6. Pain in neck, jaw, shoulder or arm which increases with physical activity.

Prevention is better than cure. Therefore, one must adopt healthy habits and exercise program approved by the expert to avoid the expensive treatment coupled with the risk of life.

Note: - This is a layman description of the disease for making public aware of the treacherous killer and is based on the oral interviews of doctor friends and patients of the heart disease. One must consult the heart experts for a detailed knowledge.

Saturday, July 22, 2017

मर्द का काम है, माफ़ी माँगना

कुछ इस तरह मैंने ज़िंदगी को आसान कर लिया, किसी से माँग ली माफ़ी, किसी को माफ़ कर दिया।

                                                                                                                        ---- मिर्ज़ा ग़ालिब। 


एक बार मैं अपनी भतीजी को गोद में घूमा रहा था।  तभी मोबाइल की घंटी बजी। एक मित्र का फ़ोन था, जो तब ऊँचे पद पर पहुँच गए थे।  मैंने मल्टी- टास्किंग करने की ठानी, सान्या को दाहिने हाथ से घुमाता रहा और बायें हाथ से मोबाइल पर बात करता रहा। बात-चीत  थोड़ी लम्बी खींच गयी थी। तभी मेरी धर्मपत्नी सान्या को नहलाने के लिए माँगने लगी। वह जाना नहीं चाहती थी, पुनीता उसे जबरदस्ती मेरी गोद से खींच रही थी। सान्या अाँ-उँ करके विरोध दर्ज कर रही थी। अपने मित्र को मैंने अचानक फ़ोन रखने के लिए कह दिया। कहने का स्वर भी अनायास ही अवांछनीय हो गया। खैर, मैनें अगले दिन खेद प्रकट करने का निश्चय किया। अगले दिन मैनें उन्हें फ़ोन भी किया, उन्होंने मुझे कुछ काम दिया था, उसकी प्रगति से भी उन्हें अवगत कराया, लेकिन संकोचवश माफ़ी नहीं माँग पाया।  यद्यपि मेरे मित्र ने सहृदयता का परिचय देते हुए मुझे माफ़ कर दिया था। इस घटना के बाद जब भी मैं उनसे मिला तो पहले जैसी ही गर्मजोशी से मिले।
 मैनें भी इस घटना से सीख ली, अब ऐसे मौकों पर मैं शालीनता से कॉल बैक करने का वादा कर देता हूँ।  
ऐसी ही एक घटना कुछ महीने पहले मेरी शाखा में घटी। मेरे 35 वर्ष पुराने मित्र ने फ़ोन करके खाते की विवरणी लाने के लिए कहा। मैनें उन्हें बताया कि अभी बहुत भीड़-भाड़ है, मैं शाम में निकलवाकर लेते आऊँगा, वे वार्तालाप लम्बी खींचना चाहते थे, मैंने फिर उनसे दरखास्त किया कि अभी मुझे छुट्टी दीजिये, शाम में विवरणी अवश्य लेता आऊँगा। लेकिन वे नहीं माने, अचानक मेरी आवाज अवांछनीय हो गयी, उन्होंने फ़ोन रख दिया। 35 वर्ष पहले हम दोनों अगल-बगल काउंटर पर बैठकर काम करते थे। अब वे अवकाश प्राप्त कर चुके थे। उनके प्रति मेरे कठोर व्यवहार ने मेरा कलेजा कचोट कर रख दिया।
 शाम में घर आकर ब्लड-सुगर जाँचा, जो काफी कम हो गया था। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें फ़ोन करके माफ़ी माँगी, उसके बाद मन हल्का हुआ। 
यदि आप दीर्घायु और स्वस्थ रहना चाहते हैं मिर्ज़ा ग़ालिब और हज़रत अली साहब की सलाह गाँठ में बाँध लीजिए।
 कई बार माफ़ी माँगना और अपनी गलती स्वीकार करना लाभ का सौदा भी बन जाता है।  1977 में कांग्रेस की अप्रत्याशित और शर्मनाक हार के बाद जब बलि का बकरा खोजा जा रहा था, श्रीमति इंदिरा गाँधी ने पराजय की सारी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले लिया। उनके विरोधियों ने भी उनके इस साहस की भूरी-भूरी प्रशंसा की।

अपनी गलती स्वीकारने और खेद व्यक्त करने की आदत मेरे घर, दफ्तर और संगठन में मेरी कठिनाइयाँ काफी कम कर देती है, क्योंकि यहाँ कोई सामान्यतया किसी भी चीज को प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाता है, मेरे नक्शे-कदम पर चलते हुए अपनी गलती भी खुले मन से स्वीकार कर  लेता है। 
इस तरह मैं और मेरे साथी तनाव-मुक्त रहते हैं।

हज़रत अली साहब  ने ठीक ही फ़रमाया है--
झुकता वही है जिसमें जान होती है।
अकड़ना तो मुर्दे की पहचान होती है।।

राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा है:-

सहनशीलता, क्षमा, दया को
 तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
 पीछे जब जगमग है।
महान और शक्तिशाली व्यक्तियों की क्षमाशीलता या क्षमा-याचना चहुँमुखी सराही जाती है, लेकिन निर्बल व्यक्ति भी इन गुणों को अपनाकर "रंगभूमि" के पात्र सूरदास की तरह  महान बन जाता है।
वर्षों पहले मेरी सासू माँ ने अपनी क्षमाशीलता से मुझे चकित कर दिया। उन्होंने मुझे फ़ोन करके एक व्यक्ति की सहायता करने का आदेश दे दिया, जिन्होंने मेरे ससुराल पक्ष के लिए अनेक समस्याएँ भूत काल में पैदा कर दी थी। यद्यपि 85 वर्षीय सासू माँ बुढ़ापे की व्याधियों से घिरी रहती है, फिर भी दुर्भावना रहित निर्मल हृदय से परिपूर्ण उनका चेहरा निरंतर चमकता रहता है। 

Tuesday, July 18, 2017

अवसाद से आरम्भ और उल्लास से अंत।



4 मार्च, 2017 को मैंने  बेहद दुखी अवस्था में बिस्तर छोड़ा। उस दिन पूरा शरीर आलस से भरा था। कोई काम करने का मन नहीं कर रहा था। पूरा संसार निरर्थक लग रहा था। भारी मन से मैं बर्तन लेकर दूध लेने गया। इस क्रम में मैं रामकृष्ण आश्रम भी टहलते चला गया।  दूध लेकर लौटने के पश्चात मैं कुछ अच्छा महसूस कर रहा था। यह दुनिया अब उतनी बेकार नहीं लग रही थी। 

फिर भी कार्यालय जाने की इच्छा नहीं हो रही थी।  जी चाहता था कि आकस्मिक अवकाश लेकर घर में ही बैठूँ। तभी मुझे हाई स्कूल के समय पढ़ा हुआ वह लेख याद आ गया जिसमें मूड बनाने का अचूक मंत्र दिया था।  लेखक ने लिखा था कि अगर कोई विशेष कार्य करने का आपका मूड नहीं हो, लेकिन वह कार्य करने योग्य हो तो आप उस कार्य में तत्क्षण जुट जाएँ। धीरे-धीरे मूड स्वतः बन जाएगा। 
अपराध विज्ञानं भी कहता है कि प्रारम्भ में प्रत्येक व्यक्ति अपराध से घृणा करता है, लेकिन परिस्थितिवश वह उसमें संलग्न होता है तो वह अपराध को बर्दाश्त करने लगता है, कुछ समय के अंतराल पर वह अपराध में पूरी तरह रम जाता है। 

अतः मैंने स्नान-ध्यान करके अपनी मारुती स्टार्ट की और कार्यालय चल पड़ा। एक बहुत पुरानी समस्या शाखा में हमें परेशान कर रही थी। उसके समाधान हेतु मैनें अपने साथी रंजन जी को बुलाया था। वे नियत समय से दस मिनट पहले ही पहुँच गये और हमलोग पूरी तन्मयता से कार्य में जूट गये। दो घण्टे में ही चमत्कार हो गया। जो समस्या शाखा को मेरे योगदान के पहले से परेशान कर रही थी, उसका बहुत ही आसान समाधान सहसा मेरे मस्तिष्क में कौंध गया। फिर क्या था ! सारे स्टाफ सदस्यों ने मुँह मीठा करके प्राप्त उपलब्धि का आनंद लिया। उस दिन घर लौटते समय अपनी गाड़ी गैरेज में पार्क कर रहा था तो मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उपलब्धि प्राप्त करने की भावना ने मेरे तन-मन को हल्का कर दिया था।  उस दिन की शाम परिवार के साथ काफी आनंददायक बीती और रात्रि की निद्रा भी मधुर रही। 

Tuesday, March 7, 2017

MY PSYCHOLOGY BEHIND CUTTING MY PROFITS.

 In 2010, I bought a few hundred shares of Reliance Communication @ Rs. 185.00 per share, now they are trading at around Rs. 35. But I am keeping them close to my heart in the hope that they will regain their lost glory of Rs. 750 per share.
 I bought 50 shares of Tata Elxsi for Rs.225 per share and sold them @Rs. 550. Now they are trading at around Rs 1450, so I have been practicing opposite to the famous yore, " Run your profits and cut your losses."
When I am in profit, I book it due to the fear that the profit will evaporate. In the case of Tata Elxsi and Well Spun India, I booked profit in the hope that I shall buy them again at dips, but they never saw dips before multiplying many times. Once I bought 700 shares of Gammon India with the target of reaping 10 times profit. The price of shares doubled in a year but I DID NOT SELL THEM KEEPING IN VIEW TEN TIMES TARGET, BUT they came down slowly and now trading below my purchase price for 4 or 5 years.
The experienced exhort that sticking to any rule will not guarantee profits always but sticking to a good rule will give you profits most of the times.
 Should I watch, 200 days moving average i.e. purchasing a share when it goes above its 200 days moving average and selling it when it goes below its 200 DMA.
I request the experienced friends to guide me.

Tuesday, February 7, 2017

बताइये आप किस श्रेणी में हैं?

1.लाख समझाओ, कुछ नहीं करता है। इस कोटि के महामानव बिरले ही पाये जाते हैं, लेकिन लोग इन्हें देखकर दूर से ही सलाम कर देते हैं।

2. जितना बताओ, उतना ही करता है जैसे:-  मजदूर, रिक्शा-चालक, ऑटो-चालक आदि। ये लोग जीवन-पर्यन्त  कठोर परिश्रम करने के बावजूद निर्धन होते हैं।

3. जितना बताओ, उतना अच्छे से अच्छे तरीके से करता है।
अच्छी से अच्छी सेवा देने वाला व्यक्ति हर जगह ढूँढा  जाता है, अनेक बार हम दूसरी श्रेणी के दस चाय की दुकानों को छोड़कर किसी विशेष चाय की दुकान पर चाय पीने जाते हैं। इस श्रेणी के व्यक्ति काफी धन और यश कमा लेते हैं।

4. बिना किसी के बताये ही करने योग्य कार्य कर देता है। ऐसे व्यक्ति बहुत ज्यादा यश और धन कमा लेते हैं।

5. भविष्य के अवसरों को भाँपकर कार्य पहले ही प्रारम्भ कर देता है। मार्क जुकरबर्ग, धीरू भाई अम्बानी आदि इस श्रेणी में आते हैं। 

खुद जाँचिए आप किस श्रेणी में हैं ? 
कौन श्रेणी बेहतर है और 
बेहतर श्रेणी में आप कैसे जा सकते हैं?

Saturday, January 14, 2017

न रिवाल्वर ने मारा, न रंगदार ने मारा

उसे न तो रिवाल्वर ने मारा, न रंगदार ने मारा, उसे तो उसी के अति-आशावाद ने मार गिराया।

वह गोरा-चिट्टा और लम्बा युवक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था, तीक्ष्ण बुद्धि भी  था, तथा अपने माता-पिता का एकलौता पुत्र था। कोटा के एक अच्छे कोचिंग संस्थान में आई.आई.टी. प्रवेश-परीक्षा की तैयारी कर रहा था। सात सौ लड़कों के बैच में उसका रैंक लगभग चार सौ आया था। मुज़फ़्फ़रपुर लौटने हेतु उसकी टिकट कट चुकी थी।  बूढ़े माता-पिता बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रहे थे।
अचानक, वह लापता हो गया। छान-बीन  करने पर उसके कमरे से एक सुसाइड-नोट मिला जिसमें उसने अपने-आपको दोषी और स्वार्थी माना था और लिखा था कि वह अपने माँ-पिता को चम्बल नदी के मंझधार में मिलेगा। पुलिस ने  चम्बल नदी में जाल डालकर उस बेचारे का क्षत-विक्षत शव निकाला। अत्याचारी अवसाद एक बलि और ले चुका था।

अवसाद आस्तीन के सांप जैसा खतरनाक होता है।  आजकल भाग-दौड़ वाली दुनिया में गला-काट स्पर्धा है। अतः अनेक लोग मनचाही  सफ़लता नहीं मिलने पर अवसादग्रस्त हो जाते हैं।
 अतः अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों पर नजर रखें। साथ ही " कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचना।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि। 
 बार-बार जोर से दुहराते रहें ताकि इसे आपके साथ आपके इष्ट-मित्र भी सुनें और उनके मनो-मस्तिष्क पर इसकी अमिट छाप पड़ जाये।
कितना भी भयानक भूकम्प अचानक आ जाये, मजबूत सरिये से बना मकान बच जाता है, इसी तरह अत्यन्त  खतरनाक अवसाद का झोंका भी शक्तिशाली संस्कारों से बने मस्तिष्क पर हावी नहीं हो पाता है। यदि आप   शक्तिशाली  संस्कार बनाना चाहते हैं तो अच्छी बातें  बार-बार पढ़ते, बोलते और सुनते  रहिये।
सभी तरह के छुपे अवसादों की कारगर दवा है,"  कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचना।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि। "
अर्थात 
  कर्म करना हमारा अधिकार है, फल देना ईश्वर का अधिकार है और ईश्वर जो भी फल देंगे, उसे हम सहर्ष स्वीकार करेंगे और भविष्य में भी पूरी तन्मयता से कर्म करते रहेंगे।
 शांति, प्रेम, आनन्द।