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Saturday, October 7, 2017

सुसंस्कारों का अभेद्य किला बनायें।




प्राचीन काल के सम्राट अपने राज्य के चारों ओर सुदृढ़ किले बनवाते थे। उनकी ऊँची और मजबूत दीवारों से टकराकर शत्रु के तीर निष्प्रभावी  हो जाते थे। प्रशिक्षित बहादुर लड़ाके हर पल किलों की सुरक्षा में तैनात रहते थे और शत्रु को देखते ही उसपर टूट पड़ते थे। 

इसी तरह नकारात्मक विचारों से बचने के लिए हमें भी अपने मस्तिष्क के चारों ओर सुसंस्कारों का अभेद्य किला बनाने की आवश्यकता है। हमें सकारात्मक विचारों वाले व्यक्तियों से मित्रता के साथ-साथ धार्मिक और प्रेरक साहित्य हमेशा पढ़ते रहना चाहिए ताकि शैतानी विचारों वाले विष बुझे तीर सुसंस्कारों से टकराकर निरर्थक हो जायें। 

सकारात्मक विचारों के लगातार प्रहार से भी नकारात्मक विचार निष्प्रभावी हो जाते हैं। अतः नकारात्मक विचार जब भी आक्रमण करें तो आप उन्हें निम्नलिखित शक्तिशाली  नारों से परास्त कर दें। 

1. वर्तमान साधेंगे, ब्रह्माण्ड सधेगा। 
2. मीरा ने पिया विष का प्याला, विष को अमृत कर डाला। 
3. अग्रसोची, सदा सुखी। 
4. जो हुआ अच्छा हुआ, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा। 
5. जलता दीपक बनें और सभी सड़े विचार जला दें। 

मैं इन नारों को दुहराते हुए अपनी ऊँगली का एक पोर हल्के से दबाता रहता हूँ। यह एंकर जैसा कार्य करता है, अतः जब मैं नारे दुहराने की स्थिति में नहीं रहता हूँ तो सिर्फ ऊँगली का वह पोर हल्के से दबाता हूँ, अवचेतन मन संबंधित नारा स्वतः  दुहराने लगता है।
एंकरिंग के सिद्धांत का आप भी पूर्ण दोहन कर सकते हैं।

Saturday, September 30, 2017

घात लगाए बैठी है, शैतान की नानी।

दुर्घटनाएँ अक्सर निश्चिंत को भयानक ढंग से फँसातीं हैं।

                                                       --- एंड्रू डैविडसन 

कदम-कदम पर शैतान की नानी बैठी है। कहाँ हम पर हमला करेगी, कह नहीं सकते। 
कुछ दिन पहले एक xylo को पुलिस ने राष्ट्रीय उच्च पथ 28  पर रोका। पुलिस के ५-६ जवान xylo की तलाशी ले रहे थे, तभी तेज गति से आ रही एक ट्रक ने  xylo को रौंद दिया, 5  लोग अविलम्ब दुनिया छोड़ गए। अनेक लोग गम्भीर हालात में अस्पताल में भर्ती थे।
मैं एक दिन बोरिंग रोड चौराहा पार कर रहा था। मोबाइल पर एक फ़ोन आया।  मेरे ध्यान बँट गया। इसी बीच एक कार ने मुझे धक्का मार दिया। कार की साइड-मिरर मेरे सिर के दाहिने हिस्से से टकराई। मैं बेहोश होकर सड़क पर गिर गया। पूरे शरीर में 5-7 जगह पर चोटें आईं। लगभग 20 दिन परेशान रहा। 6.59 बजे शाम में मैं ठीक-ठाक था। 7.03 बजे दुर्घटना में घायल हो चुका था। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि कार की साइड मिरर मेरे सिर में टकराई थी तो काफी जोर की आवाज हुई थी और मैं बेहोश हो गया था। इस तरह तो मेरी जान सलामत रह गई, यह बड़ी बात थी।
पलक झपकते भयानक दुर्घटनाएं हो जाती हैं, क्योंकि शैतान की नानी हमें नुकसान पहुँचाने के लिए हमेशा घात लगाए बैठी रहती है। थोड़ी सी भी चूक हुई नहीं कि वह दुर्घटना के रूप में हमें अपने शैतानी आगोश में ले लेती है। 
अतः समय की मांग है कि हम दुर्घटनाओं के बारे में पढ़कर यह न सोचें कि ऐसा हमारे साथ नहीं होगा, बल्कि यह सोचें कि दुर्घटनाएँ कहीं भी और कभी भी हो सकती हैं और उनसे बचने के लिए हर पल न सिर्फ सतर्क रहें बल्कि दूरदर्शिता भी दिखायें। 



Sunday, August 27, 2017

अपना मस्तक ऊँचा रखें




   आप अपने व्यक्तित्व को दो प्रकार से  निखार सकते हैं।
1. अपने कार्यकलापों को बदल दें।
  
2. अपने विचारों को बदल दें। 

एक विश्वप्रसिद्ध कहावत है," एक सोच रोपें एक कार्य उपजेगा; एक कार्य रोपें, एक आदत पैदा होगी; एक आदत रोपें, एक चरित्र पायें और एक चरित्र रोपकर अपना भाग्य काट लें।

लेकिन, सोचने की महीन प्रक्रिया पर नियंत्रण रख पाना अत्यंत कठिन होता है। अतः बुद्धिमानगण अच्छी पुस्तकें पढ़ने और सकारात्मक लोगों के संग रहने की सलाह देते हैं। लेकिन, सही सोच वाले लोगों को विनाशकारी विचारों से रक्षा करने के लिए हम हर पल अपने पास नहीं रख सकते हैं।

नकारत्मक सोच जब हावी होते हैं तो हमारा मस्तक नीचे झुक जाता है।
अतः नकारात्मक विचारों के हमले को रोकने के लिए हमेशा सीना ताने रहें और मुस्कराते हुए मस्तक ऊँचा रखें।

मुस्कराहटयुक्त ऊँचा मस्तक न सिर्फ आपके अंग-विन्यास और आपके स्वास्थ्य को ठीक रखता है बल्कि  
अवसादग्रस्त विचारों को भी रोक देता है।

आपका ऊँचा मस्तक अबसेंटमिन्डेडनेस को हावी नहीं होने देता है।
आपका ऊँचा मस्तक आपको सकारात्मक विचारों से सराबोर रखता है।

 सकारात्मक विचारों को अनुकरणीय कार्य-कलाप में परिणत कर देने वालों का संसार अत्यंत सम्मान करता है।




Saturday, August 12, 2017

हमारे रंगीन चश्मे


'एथेंस का सत्यार्थी' के नायक ने जिद करके नँगा सत्य देखने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप, उसकी आँखें चौन्धिया गयीं और वह अंधा हो गया।

सच पूछिए तो अपने बारे में नग्न सत्य हम भी नहीं बर्दाश्त कर पाते हैं। अतः अपनी आंखों पर रंगीन चश्मे लगाकर खुद को धोखा देते हैं।

अमिताभ बच्चन की सुप्रसिद्ध फ़िल्म शराबी याद कीजिये। शराब की अपनी बुरी लत को तर्कसंगत बनाने के लिए एक गाने में उन्होंने सारे संसार को नशे में धुत बता दिया।

प्रत्येक व्यक्ति अपनी आंखों के सामने पाक-साफ दिखना चाहता है। मसलन यदि मैं कामचोर हूँ तो कम से कम अपनी नज़रों के सामने गिरना नहीं चाहूँगा। अतः अपने-आप को ठगने के लिए मुझे एक रंगीन चश्मा पहनना होगा, जिस चश्मे से सारा विश्व कामचोर दिखेगा। लेकिन बात इतने पर समाप्त नहीं होती है। मुझे अपनी अदालत में दूसरों को कामचोर साबित करके दिखाना पड़ेगा, ताकि मैं अपनी कामचोरी को आम इंसानी कमजोरी मानकर तर्कसंगत साबित कर सकूँ।
यहीं से सारे झगड़ों की शुरुआत होती है। मैं अपने अधीनस्थों पर कामचोरी का आरोप लगाता हूँ, चाहे वे कितनी ही तन्मयता या अतन्मयता के साथ अपना कार्य कर रहे हों। बदले में वे भी मेरा प्रतिरोध प्रारम्भ कर देते हैं। फिर गुट बनते हैं। लोग एक दूसरे को नीचे दिखाने के लिये प्रयत्न-रत हो जाते हैं और अपने दिन की चैन और रात की नींद हराम कर लेते हैं।

परस्पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच टीम-भावना की बलि चढ़ाई जाती है और परिवार, समाज और संस्थाएं इसका भारी मूल्य चुकाती हैं।
टीम-भावना के समाप्त होने के कारण हम निर्रथक झगड़ों में फंस के रह जाते हैं। परिणामस्वरूप, हम मनोवांछित सफलताएँ नहीं प्राप्त कर पाते हैं और जीवन के हमारे बहुत सारे अरमान अधूरे रह जाते हैं।

आखिर इस गम्भीर बीमारी का क्या इलाज हो सकता है?



Saturday, January 14, 2017

न रिवाल्वर ने मारा, न रंगदार ने मारा

उसे न तो रिवाल्वर ने मारा, न रंगदार ने मारा, उसे तो उसी के अति-आशावाद ने मार गिराया।

वह गोरा-चिट्टा और लम्बा युवक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था, तीक्ष्ण बुद्धि भी  था, तथा अपने माता-पिता का एकलौता पुत्र था। कोटा के एक अच्छे कोचिंग संस्थान में आई.आई.टी. प्रवेश-परीक्षा की तैयारी कर रहा था। सात सौ लड़कों के बैच में उसका रैंक लगभग चार सौ आया था। मुज़फ़्फ़रपुर लौटने हेतु उसकी टिकट कट चुकी थी।  बूढ़े माता-पिता बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रहे थे।
अचानक, वह लापता हो गया। छान-बीन  करने पर उसके कमरे से एक सुसाइड-नोट मिला जिसमें उसने अपने-आपको दोषी और स्वार्थी माना था और लिखा था कि वह अपने माँ-पिता को चम्बल नदी के मंझधार में मिलेगा। पुलिस ने  चम्बल नदी में जाल डालकर उस बेचारे का क्षत-विक्षत शव निकाला। अत्याचारी अवसाद एक बलि और ले चुका था।

अवसाद आस्तीन के सांप जैसा खतरनाक होता है।  आजकल भाग-दौड़ वाली दुनिया में गला-काट स्पर्धा है। अतः अनेक लोग मनचाही  सफ़लता नहीं मिलने पर अवसादग्रस्त हो जाते हैं।
 अतः अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों पर नजर रखें। साथ ही " कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचना।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि। 
 बार-बार जोर से दुहराते रहें ताकि इसे आपके साथ आपके इष्ट-मित्र भी सुनें और उनके मनो-मस्तिष्क पर इसकी अमिट छाप पड़ जाये।
कितना भी भयानक भूकम्प अचानक आ जाये, मजबूत सरिये से बना मकान बच जाता है, इसी तरह अत्यन्त  खतरनाक अवसाद का झोंका भी शक्तिशाली संस्कारों से बने मस्तिष्क पर हावी नहीं हो पाता है। यदि आप   शक्तिशाली  संस्कार बनाना चाहते हैं तो अच्छी बातें  बार-बार पढ़ते, बोलते और सुनते  रहिये।
सभी तरह के छुपे अवसादों की कारगर दवा है,"  कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचना।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि। "
अर्थात 
  कर्म करना हमारा अधिकार है, फल देना ईश्वर का अधिकार है और ईश्वर जो भी फल देंगे, उसे हम सहर्ष स्वीकार करेंगे और भविष्य में भी पूरी तन्मयता से कर्म करते रहेंगे।
 शांति, प्रेम, आनन्द। 

Monday, November 7, 2016

कौन थी वो जेबकतरी?

19 अगस्त, 2016 को मैं एक भीड़-भाड़ वाली जगह पर गया। वहाँ  अनेक स्थानों पर "पॉकेटमारों से सावधान "लिखा हुआ था ;रूटीन चेतावनी मानकर  मैंने इसपर ध्यान नहीं दिया। मेरी  धर्मपत्नी और छोटा सुपुत्र रौनक भी मेरे साथ था। मैं अपनी मैडम के पीछे-पीछे कतार में चल रहा था। तभी एक साँवली युवती  दूसरे कतार से मेरे पत्नी के पीछे चलने लगी। लड़की है, यह सोचकर मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया।  धीरे-धीरे अनेक युवतियाँ मेरे और मेरी अर्धांगिनी  के बीच में आ गयीं। रौनक मेरे ठीक पीछे था। रास्ते में थोड़ी दूर आगे मिनरल जल की बोतल दस रूपये प्रति बोतल की दर से बिक रहा था। मेरे और मेरी पत्नी के बीच की दो-तीन लड़कियाँ मिनरल जल खरीदने लगीं और साथ ही साथ हम लोगों की तरफ देख भी रही थीं।  दस रूपये बोतल मिनरल जल खरीदने का लोभ मैं भी सँवरण नहीं कर पाया। मैनें और रौनक ने एक-एक बोतल जल खरीदा।  इस  दौरान  हमारा  ध्यान  मैडम  पर  से  कुछ  समय  के  लिए  हट  गया। 

थोड़ी दूर आगे अब मेरी अर्धांगिनी अकेले चल रही थीं  और उनका हरा  हैंडबैग  उनके  दाहिने कन्धे से लटक रहा था ।  उनके पीछे की लड़कियां न जाने  कहाँ  उड़ गयी थीं।  रौनक ने अपनी  माताश्री  को रोका, फिर हम साथ चलने लगे। दर्शन करके हमलोग बाहर निकले। कैफ-कॉफ़ी हाउस में  गरमा -गरम  कॉफी  का  मजा  लेने के थोड़ी देर बाद हम लोगों ने स्वादिष्ट भोजन किया और होटल जाकर सो गए। उठने के बाद धर्मपत्नी ने किसी काम से अपना हैण्ड-बैग खोला तो उनका पर्स  लापता था। हमलोग फिर मन्दिर में गए। वहां के सुरक्षा अधिकारी के पास अनेकों खाली पर्स पड़े थे, लेकिन  उनमें हमारा पर्स नहीं मिला। 

बाद में इस दुर्घटना के बारे में विवेचना करने पर पाया कि मेरी यह सोच कि लड़कियाँ चोरी नहीं करेंगी और अगर इतनी भीड़ में कोई चोरी करेगा तो कोई न कोई देख ही लेगा ; गलत थी, जिस कारण हमलोग जेबकतरियों के गैंग के शिकार हो गए  और  उन्होंने  हैंडबैग  बड़ी  सफाई  से  खोलकर  पर्स  निकाल लिया  और  फिर  हैंडबैग  बन्द  भी  कर  दिया।  बाद  में  दुकानदारों  ने बताया  कि  वहाँ  ऐसे  निपुण  पॉकेटमार  हैं  जो  रास्ता  चलते  लोगों  का  पर्स  भी  बड़ी  सफाई  से  मार  देते  हैं।  एक  विशेष  बात  यह  भी  हुई थी  कि  वहाँ  मौजूद  अनेक  लोगों  ने  गेट  संख्या  2 से  दर्शन  करने  जाने  की  सलाह  दी  थी।  अतः  आप  जब  साईं  बाबा  के दर्शन  करने  शिरडी  जब  भी जाएँ  तो  अन्य  गेटों  से  दर्शन  करने  की  सम्भावना  पर  विचार  करें। 

अगले दिन हमलोग शनि मन्दिर में दर्शन करने गए।  दर्शन के बाद पत्नी एक पेड़ के नीचे  चबूतरे पर बैठी थी। तभी  स्मार्ट  कपड़ों  में एक अनजान खूबसूरत युवती आकर मेरी पत्नी के बगल में बैठ गई।  चूँकि मैं दूध का जला  था अतः मैनें मट्ठा भी फूँक-फूँक कर पीने की ठानी। मैं तुरत आकर वाइफ के सामने खड़ा होकर बात करने लगा। वह लड़की एक मिनट के अंदर उठकर चल दी। 

मेरे कई परिचित चलती ट्रेन में चोरों के शिकार हो चुके हैं। वे ऊपर वाली सीट पर सामान रखकर  बैठे थे। कुछ चोर ऊपर वाली सीट पर पालथी मारकर बैठ गए और समाचारपत्र पढ़ने लगे। इसी बीच न जाने कब वे सूटकेस का ताला खोलकर सारा कीमती सामान निकाल  कर  चम्पत  हो  गए।  यद्यपि उन्होंने यह अनुभव मेरी गृहणी का पर्स चोरी होने के बाद बताया। 

Friday, October 14, 2016

संक्रमण भगाएँ, स्वास्थ्य लाएँ

आपने मृत  पशु  अवश्य  देखा  होगा।  उसके  देहांत  के    बाद  अविलम्ब  दुर्गंध नहीं  फैलता है।  शव  जैसे-जैसे  सड़ता  है , हवा  में  बदबू  फैलने  लगती  है।  धीरे-धीरे   शव  सूखता  जाता है, एक समय ऐसा भी आता है, जब  शव  सूखकर  समाप्त  हो  जाता है। साथ  ही दुर्गंध भी समाप्त  हो जाता  है। 
 यक्ष -प्रश्न  यह है कि  शव  बिना  हटाये  कहाँ  चला  जाता  है। उसके बहुत  छोटे-छोटे  टुकड़े  अदृश्य बैक्टीरिया  में  परिणत होकर हवा  में  तैरते-तैरते समाप्त  हो  जाते  हैं। उधर  से  गुजरने  वालों  के  सम्पूर्ण  शरीर  को अदृश्य  बैक्टीरिया  दुष्प्रभावित करते रहते  हैं। 

अतः बदबूदार स्थानों पर बदबू होने का मुख्य कारण हवा में तैरते बैक्टीरिया होते हैं। अतः जब हम बदबूदार स्थानों पर जाते हैं तो हमारा पूरा शरीर हवा में तैरते इन बैक्टिरिया के बीच में चला जाता हैं। यह एक तरह से प्रदूषित हवा में डूबकी लगाने जैसा होता है। अतः यथासम्भव बदबूदार स्थानों से दूर रहने में ही भलाई है। यथासम्भव  समाज में या घर में भी दुर्गंध न पैदा होने दें।

मेरे मित्र का छः साल पहले किडनी प्रत्यर्पण हुआ। वे आज भी पूर्णतः स्वस्थ हैं। उन्होंने बताया कि किडनी प्रत्यर्पण के बाद चिकित्सक ने उन्हें संक्रमण से बचाव के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए।
1.सत्तर से अस्सी प्रतिशत मामलों में संक्रमण मल-मूत्र त्याग करते समय होता है। अतः वाश रूम हमेशा साफ-सुथरा रखें।


2. यात्रा करते समय फिनाइल अपने साथ रखें और सार्वजानिक शौचालयों में मल-मूत्र त्याग करने के पहले उसमें पानी मिलाकर शौचालय में डाल दें।


 रेल यात्रा के समय फेनाइल रखने का प्रयोग एक नयी क्रांति लाएगा।
 मेरे एक अन्य मित्र प्रमोद बाबू को को गन्दे शौचालय में मूत्र-त्याग के बाद संक्रमण हो गया था, बेचारे को अंततः पी.जी.आई. लखनऊ में  इलाज  कराना  पड़ा।  

Tuesday, October 11, 2016

याददाश्त देती है अक्सर धोखा

दुःशासन द्वारा चिरहरण के असफल प्रयास के पश्चात द्रौपदी ने प्रतिज्ञा किया कि  जब तक उसके  रुधिर से अपने बाल न धोएगी, तबतक  उन्हें  खुला रखेगी। अनिश्चित काल तक बाल खुले रखे बिना भी द्रौपदी यह कसम  खा सकती थी । यह  घोर अपमान पांडव भी भूलने वाले नहीं थे, फिर भी द्रौपदी अपने बाल खुले रखकर उन्हें हर पल  उस अपमान की याद दिलाती रहती थी, क्योंकि ईश्वर ने हमें क्षीण स्मरण-शक्ति दी है।  
कुछ  दिनों  पहले  मैंने  'अलकेमिस्ट ' तीसरी  बार  पढ़ी , लेकिन  लग  रहा  था , जैसे  कई  प्रसंग  बिलकुल  नए  हैं ?  बिरले  ही  कोई ठीक-ठीक  यह बता  पायेगा  कि  पिछले  सप्ताह  उन्होंने  किस  रंग की शर्ट -पैंट  पहनी  थी।  मेरे  एक मित्र ने  तो  यह  चुनौती  दे दी  कि  आप  यह  भी  नहीं  बता सकते  कि  दो  घण्टे  पहले  आप  किस  विचार  से  व्यथित  या  प्रसन्न  हो रहे  थे ?

एक बार मुझे २८ सितम्बर तक क्रेडिट-कार्ड के 6084 रूपये भरने थे। मैनें न तो इसे  To Do लिस्ट में लिखा और न ही कैलेंडर में  जोड़ा , क्योंकि मैं मानकर चल रहा था कि क्रेडिट-कार्ड का बकाया भूगतान करना, मैं भूल ही नहीं सकता। संयोगवश मैं बैंक की अर्धवार्षिक लेखाबंदी में व्यस्त था; इसी  बीच  28 सितम्बर  दबे  पाँव आया और चला गया। क्रेडिट-कार्ड वालों ने अच्छा-खासा जुर्माना ठोक दिया। मुझे 6084 रुपयों के बदले 6617 रूपये भरने  पड़े।  
अतः Repetition और Association से याददाश्त को सहायता करने के साथ-साथ  आप उन चीजों को व्यवस्थित ढंग से लिख भी लें। 
क्रेडिट-कार्ड कम्पनियाँ 50 दिनों तक ब्याज-मुक्त ऋण देकर भी मुनाफे में रहती हैं, शायद उन्हें मेरे जैसे भुलक्कड़ भारी संख्या में मिल जाते होंगे। 
मुझसे अनेक ग्राहक मिलते हैं, जिनकी लॉकर की चाभी या फिक्स्ड-डिपोजिट की रसीद  खो गयी रहती है, अगर किसी  विशेष  सामान को एक खास  स्थान  पर  रखने की आदत बनायें और परिवार के किसी जिम्मेदार सदस्य को भी यह जानकारी दे दें तो यह समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है और  बैंकों  में  बिना  किसी  दावेदार  के  पड़ी  अरबों  रुपयों  की  राशि में  भी  भारी  कमी  होगी। मैंने  तो लाखों  के  गहने  वाले  अनेक दावेदार विहीन लॉकर भी  देखे  हैं।  

Sunday, October 9, 2016

अकल तो चाहिए, नकल को भी

एक अस्पताल के बाहर घोंचू लाल  की कफ़न की दुकान थी।  दुकान काफी दिनों से मंदी चल रही थी। दीपावली का त्यौहार नजदीक था। घोंचू लाल अपने सुपुत्र पोंचू लाल के साथ चिंतित रहते थे कि दिवाली का पर्व बिना आमदनी के कैसे मनाएंगे ? 

इसी बीच धन-तेरस आ धमका।  घोंचू लाल ने अपने सुपुत्र को दस रूपये दिए और बोले," बेटा, कम से कम एक चम्मच ही खरीदकर सगुण कर लो। पोंचू लाल बाजार गए।  वहाँ  रात  में  भी  दिन  जैसा  माहौल था।  पूरा  बाजार  रौशनी  से  जगमगा  रहा  था।  बर्तनों और गहनों की एक से एक दुकानें सजी थी। एक दुकान पर भारी भीड़ लगी थी। वहां एक बड़ा बर्तन खरीदने पर छोटा बर्तन मुफ्त मिल रहा था। पोंचू लाल ने भी एक बड़े चम्मच के साथ एक छोटा चम्मच लिया और ख़ुशी-ख़ुशी लौट आये। 

अपनी दुकान पर पहुंचकर उन्होंने उपरोक्त स्कीम अपने पिताश्री को बताई।  बाप-बेटे को यह आईडिया हिट लगा। अगले दिन वे दोनों भी अपनी दुकान पर जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, " सेल-सेल ,महासेल !एक सयाने का के कफ़न के साथ बच्चे का कफ़न मुफ्त ले लो। "

देखते-देखते घोंचू और पोंचू की दुकान के चारों तरफ भीड़ लग गई। जिसके हाथ में जो भी आया, उसी से घोंचू और पोंचू को धोने लगा। जिनके  हाथ  में कुछ  नहीं  था , वे लप्पड़-झप्पड़  से  ही  काम  चला रहे थे। बाप-बेटे गिरते-पड़ते घर भागे। 

एक बात उन्हें आज तक समझ में नहीं आई कि जो स्कीम बर्तन-दुकान पर हिट थी, वही स्कीम  कफ़न - दुकान पर कैसे पिट गई?

अगर आपकी समझ में आये तो उन्हें जरूर बता दीजिएगे। 

Saturday, October 8, 2016

जिधर देखो उधर ही अवसर

 मैं खुद से जो सवाल हर दिन पूछता हूँ,क्या मैं वो सबसे ज़रूरी काम कर रहा हूँ जो मैं कर सकता हूँ?

             --- मार्क ज़ुकेरबर्ग



एक ब्राह्मण देवता एक सम्पन्न  गाँव में रहते थे। उनके पास एक काले रंग की घोड़ी थी जिसपर  वे जान छिड़कते  थे और उसपर ही सवार होकर जजमानों के यहाँ जाते थे। एक दिन वे घोड़ी लेकर  पूरब की ओर निकले। उसका मन उस दिन आराम करने का था। अतः वह बेमन से धीरे-धीरे चल रही थी। पंडित जी को गुस्सा आया और उन्होंने घोड़ी को जोर से चाबुक मारा। घोड़ी जोर से हिनहिनाई और पूरब के बदले पश्चिम की ओर दौड़ने लगी। पण्डित जी जोर से चिल्लाये ," कोई बात नइखे ससुरो, उधरो  दो-चार जजमान बा"

आशावादी और उत्साही लोग कहते हैं,"रुपया आसमान में उड़ रहा हैं , उसे देखने के लिए प्रशिक्षित आँखें  चाहिए और पकड़ने के लिए निपुण हाथ चाहिए। "

एक मूर्तिकार  ने अवसर की प्रतिमा बनाई थी , जिसके सिर के आगे बाल थे और पीछे गंजा था, अतः अवसर को वही पकड़ सकता है, जो उसके आने के पहले पूरी तरह तैयार रहता है। 

मार्क जुकरबर्ग ने  कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर में बचपन से प्रशिक्षण और रूचि लिया। 4 फरवरी, 2004 को उन्होंने हार्वर्ड के अपने डॉरमिटरी से फेसबुक लॉंच किया और आज  संसार के चौथे सबसे अमीर आदमी हैं।  

Sunday, October 2, 2016

कल्पना में कंजूसी क्यों ?

एक बार एक व्यक्ति दायें हाथ में रोटी लेकर बायीं हथेली में सटाकर खा रहा था। उसके साथी को यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ। साथी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा," भाई, तेरी बाँयी हथेली खाली है, फिर तू बार-बार  रोटी बायीं हथेली में सटाकर क्यों खा रहे हो ? उस व्यक्ति ने बड़ा दुःखद उत्तर दिया," मैं कल्पना कर रहा हूँ कि मेरी बायीं हथेली में नमक है और मैं नमक के साथ रोटी खा रहा हूँ। " उसके साथी को बड़ा सदमा लगा, साथी ने माथा ठोकते हुए कहा," मुर्ख! अगर तुझे कल्पना ही करनी है तो कल्पना कर कि तेरी बायीं हथेली पर मलाई है और तू मलाई-रोटी खा रहा है। 

अगर परिवार का कोई भी व्यक्ति घर आने में देर करता था तो माँ घबराने लगती थी और उनके मन में बुरे ख्याल आने लगते थे। एक बार पिताजी देरी से आये , माँ  घबराई हुई थी ; उनके  मन में  भयानक  विचार  आ  रहे थे जब कि पिताजी होली की खरीददारी करने में व्यस्त थे। 
मिथिला  में  अनेक श्रद्धालुओं  की  मान्यता  है  कि  इच्छा  देवी  हर  पल  विचरण  करती  रहती  हैं , वे  जिधर  भी  जाती  हैं , लोगों  की  इच्छाएं  पूरी  कर  देती  हैं।  अतः जो जैसा  सोचता और  बोलता  है , वैसा  ही  पाता  है।  प्रसिद्ध लोकप्रिय कहावत  "मंशे  फल  नियते  बरक्कत " भी  इस  धारणा  की  पुष्टि  करती  है। 

अत जब कल्पना ही करनी है तो अच्छी कल्पनाएं करें, आप जैसी कल्पना करेंगे, वैसा ही परिणाम आपको मिलेगा क्योंकि हर पल अपना दुःख रोने वालों के पास दुखों का पहाड़ आता हैं और सकारात्मक सोच रखने वालों और सकारत्मक बातें करने वालों के जीवन में अच्छी बातें होती रहती हैँ। 
अगर आपको मेरी बात पर विश्वास नहीँ हो तो अपने कार्यालय, परिवार या मुहल्ले में  दोनों  प्रकार  के  पांच या दस लोगों की सूची बनाकर आप खुद परख सकते हैं।  

Saturday, March 26, 2016

आज के लिये उर्जापूर्ण और प्रेरणादायक प्रार्थना.

यह उर्जापूर्ण एवं  प्रेरणादायक प्रार्थना सुबह के सुस्ती और अवसाद को दूर भगाने में उपयोगी है. नींद टूटने के ठीक बाद इसे  बार-बार दुहराकर लाभ उठायें.

 
हे प्रभु, आपका कोटि-कोटि आभार !आज मैं साँसे ले रहा  हूँ। आज मेरे सपनों को साकार करने के लिए सुनहला अवसर है।
 
आज मैं सभी साधनों का सदुपयोग पूरी कुशलता से अपने उद्देश्यों की सिद्धि हेतु करुँगा। 
 
आज मैं अतीत पर व्यर्थ चिंतन कर या निरर्थक झगड़ों, मनोरंजनों आदि में उलझकर अपनी सर्जनशीलता बाधित नहीं करूँगा औऱ अपनी मानसिक शक्तियों का उपयोग सिर्फ रचनात्मक कार्यों के लिये ही करुँगा।

 
 आज मैं हमेशा शांत रहूँगा। अच्छी तरह से सोच-समझकर कम-से-कम,मधुर और प्रेरणादायक वचन बोलूँगा तथा शिष्टाचार, सद्भाव एवम शुभकामनायें ब्यक्त करता रहूँगा ।
 
आज मैं लगातार अपने जीवन लक्ष्य की ओर बढता जाऊँगा।
 
आज मैं अधिक से अधिक उद्यम करूँगा। योजना बनाकर कठोर श्रम करना मेरे लिए सरल औऱ स्वाभाविक है।
आज मैं "कल करे सो आज कर, आज करे सो अब" के सिद्धांत को जीवन में चरितार्थ करूँगा।

हे प्रभु,आपकी उपस्थिति  उर्जापूर्ण और प्रेरणादायक है.आपने काफी उम्मीदों के साथ मुझे इस धरा पर भेजा है.  आज मैं आपकी उम्मीदों पर खड़ा उतरुँगा . मैं आपकी संतानों की यथासम्भव मदद करूँगा और उनका जीवन आसान बनाने का भरसक प्रयास करूँगा. आज मैं महान् सफलताएँ  पाऊँगा.
 
यदि आपको यह प्रार्थना अच्छी लगी तो अपने मित्रों को भी बताएं.
 

Monday, March 14, 2016

नहीं सुनकर हिम्मत नहीं हारें ।


प्रायः हम किसी से कुछ माँगते हुए काफी संकोच करते हैं कि वह
क्या कहेगा या क्या सोचेगा?
अधिकांश मामलों में यह डर एकदम गलत होता है। अतः अपनी बात  पूरे आत्मविश्वास के साथ रखने का अभ्यास करें। सामान्यतः आपकी बात बिना किसी परेशानी के मान ली जायेगी।


  'नहीं' सुनने के डर से मत घबरायें। अगर कोई सचमुच भी आपकी बात मानने से इंकार कर दे तो भी हिम्म्त नहीं हारें। अपनी बात के पक्ष में तर्क देकर उसे मनाने की हर संभव कोशिश करें। हो सकता है कि आपके तर्क से सहमत होकर वह आपकी बात मान ले।

महाभारत में श्रीकृष्ण ने दानवीर कर्ण को पाण्डवों के पक्ष में करने के लिये कुन्ती को भेजा। कुन्ती ने कर्ण को पुत्र कह कर सम्बोधित किया और ममता का हवाला दे कर पाण्डवों के पक्ष में करने के लिए काफी अनुनय-विनय किया।  लेकिन कर्ण अपने घनिष्ठ मित्र दुर्योधन का साथ छोड़ने के लिये राजी नहीं हुआ यद्यपि कुन्ती ने यह आश्वासन ले ही लिया कि वह युद्ध में वह इन्द्रपुत्र अर्जुन के अलावा और किसी भ्राता का वध नहीं करेगा।  श्रीकृष्ण ने भी हिम्मत नहीं हारी। सूर्य-पुत्र कर्ण के पास कवच और कुंडल रहने के कारण वह युद्ध में  अपराजेय था। अतः अधर्म को पराजित करने के लिये श्रीकृष्ण ने इन्द्र की मदद ली।  ब्राह्मण का वेश धारण कर इन्द्र को अनिच्छापूर्वक कर्ण से कवच-कुण्डल दान में मांगना पड़ा। 

अपनी बात लोगों से स्वेच्छापूर्वक मनवा लेना एक कला है। इस कला में आप जितने पारंगत होंगे, सफलता उतनी ही गर्मजोशी से आपके क़दमों को चूमेगी। 

Thursday, October 29, 2015

वृद्धाश्रम या वृद्धमोहल्ला

बुढ़ापा  शेष  अन्य  चीजों  जैसा  ही  है , इसे  सफल  बनाने  के  लिये  आपको जवानी  में  ही  शुरुआत  करनी  पड़ती  है। --- थिओडोर  रूज़वेल्ट 

आजकल सोशल-मीडिया पर वृद्धाश्रम पर अत्यन्त भावनात्मक लेख पोस्ट किये जा रहे हैं, जिन्हें पढ़कर कलेजा मुँह को आ जाता है। यह एक बड़ी विडंबना है कि सोशल मीडिया पर भावनात्मक लेख लिखने वाले कुछ लोग अपनी वास्तविक जिंदगी में ठीक उसका उल्टा करते हैं। कुछ लोगों को तो  मैं अच्छी  तरह से  जानता हूँ , लेकिन नाम बताने की हिम्मत तो मे्रे पुरखे भी नहीं कर पाएंगे। इसमें अन्यथा लेने वाली कोई  बात भी  नहीं है क्योंकि ,"मुख में राम बगल में छुरी"वाली कहावत तो कोई नई  नहीं है।

ऐसे देखा जाए तो हमलोग भी वृद्ध-मोहल्ले में रहते हैं। हमारे मोहल्ले में अधिकांश युवक बंगलुरु या अन्य  बड़े शहरों  में काम करते हैं और उनके माँ-बाप यहाँ अकेले रहते हैं। कई बार बच्चे जिद करके हमें अपने साथ ले जाते हैं , लेकिन कुछ दिन बाद भागकर हमलोग फिर बैंकर्स कॉलोनी, मुजफ्फरपुर आ जाते हैं, क्योंकि वहां हमारा मन ही नहीं लगता है। ईश्वर की असीम कृपा से हमलोगों को बच्चों पर आश्रित नहीं रहना पड़ता है, लेकिन प्रौढ़ अवस्था या बुढ़ापा अकेले बिताना भी काफी चुनौतीपूर्ण कार्य है।

लोग प्रायः कहते हैं कि माँ-बाप बच्चों की इतने शौक से परवरिश करते हैं, लेकिन बच्चे अपने माँ-बाप को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं। वस्तुतः बच्चे इतने मनोहर होते हैं कि लोग दूसरों के बच्चों से खेलने में भी आनंदित हो जाते हैं। कोई बच्चा आपको देखकर जबरदस्ती सम्मान नहीं मांगता है और न ही वह आपसे  किसी की शिकायत करता है, वह सिर्फ आपको देखकर हँसता-मुस्कराता है। मेरे पड़ोस की बच्ची जब भी मुझे देखती है, हँसते हुए मेरी तरफ दौड़ती है, मैं भी उसे गोद में उठाकर प्यार करता हूँ और थोड़ी देर के लिए अपना तनाव भूल जाता हूँ। वस्तुतः बच्चे अपने-आपको इतना हल्का बना लेते हैं कि हर कोई उन्हें उठा लेता है। वे अपने माँ-बाप को कभी यह नहीं कहते कि आपने मुझे पैदा किया है तो आपको मेरा लालन-पालन करना ही पड़ेगा। अर्थात वे अपना अधिकार नहीं मांगते हैं, बल्कि अपनी प्यारी छवि से सब काम करा लेते हैं।

 मेरे मित्र अरुण जी के पिता जी अत्यंत बूढ़े थे, जब भी मैं अरुण जी से मिलने जाता था, चाचा जी के लिए पान लेकर जाता था, क्योंकि वे पान के बहुत शौक़ीन थे  और  बहुत खुश होते थे, थोड़ी देर मैं उनके पास बैठकर बात करता था। वे मेरे परिवार के सदस्यों के कुशल-क्षेम पूछते थे।  कभी भी उन्होंने अपने बेटे या बहू की  शिकायत नहीं की। अगर शिकायत करते तो शायद मैं उनके पास बैठ भी नहीं पाता। कभी उनके बच्चों या बहू ने भी उनकी शिकायत नहीं की। यद्पि बुढ़ापा काफी कष्टकारी होता है, फिर भी उन्होंने अपने मन में दूसरों के प्रति खटास नहीं पाली और काफी संतुष्टि के साथ इस संसार को अलविदा कहा। मैं ऐसे बुजुर्गों को भी जानता हूँ , जो हर बात में मीन-मेख निकाल कर न सिर्फ अपनी जिंदगी नरक बना लेते हैं, बल्कि पूरे परिवार के लिए भारी मुसीबत बन जाते हैं।
मुझे तो श्रवण कुमार की कहानी पढ़कर बड़ा अटपटा लगता है। श्रवण कुमार माँ-बाप की भक्ति के लिए आदर्श थे। आदर्श तो लाखों में एक होता है तभी उसकी उपमा दी जाती है, अगर श्रवण कुमार लाखों में एक थे तो तब शेष बच्चे कैसे थे ? और क्यों  वर्षों  से  यह  कहावत चली  आ  रही  है  कि  बाप  बनकर  कोई  किसी  से  कुछ  नहीं  ले  सकता  है। 

 बेवफाई एक शाश्वत सत्य है।  अपने शरीर से ज्यादा प्यारा कौन हो सकता है, बचपन से इसका हम कितना ख्याल रखते हैं, बढ़िया से बढ़िया भोजन कराते हैं, सुन्दर वस्त्र पहनाते हैं, इत्र, क्रीम और महंगे साबुन लगाते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा कष्ट भी हमें अपना शरीर ही देता है।अनेक प्रकार की बीमारियों को पालकर शरीर  हमें कष्ट देता है और  बुढ़ापे में  भी  साथ नहीं  देता है। एक दिन तो  यह पूरी तरह जवाब दे देता है।

   ईसा मसीह ने दस कोढ़ियों को ठीक कर दिया, उनमें से सिर्फ एक उन्हें धन्यवाद देने आया, शेष नौ ने इस  छोटी  सी  औपचारिकता  को  निभाना भी उचीत नहीं समझा। तात्पर्य यह है कि यह निर्मम संसार युगों-युगों से ऐसा ही है और ऐसा ही रहेगा। बेहतर है कि इस संसार के अनुसार हम अपने-आप को ढाल लें। 
 बिंदास जीने का नाम ही जीवन है।  अतः बच्चों के साथ रहें, वृद्धाश्रम में या वृद्धमोहल्ले में रहें, अपने अस्तित्व से दूसरों को खुश रखें, उनपर कम से कम बोझ बनें और बिंदास जियें।

Sunday, April 19, 2015

अगर दिल खोलते यारों के साथ

सुना है कि एक हार्ट हॉस्पिटल के ऑपरेशन-कक्ष  पर लिखा था ," अगर दिल खोलते  यारों के साथ तो खुलवाना न पड़ता औजारों के साथ "

एक दिन मैं काफी परेशान था। उसी समय मेरे एक मित्र अपनी समस्या-समाधान हेतु मेरे कक्ष में आये। उनकी बातें धैर्यपुर्वक सुनकर मैंने उन्हें आश्वासन दिया,"कुछ महीनों में मैं आपकी समस्या  सुलझा दूँगा।"
 परन्तु वे अपनी समस्या का शीघ्र समाधान चाह रहे थे, यद्यपि मुझे अविलम्ब कोई हल नजर नहीं आ रहा था।
 मैंने उन्हें समझाने कि पुरजोर कोशिश की, लेकिन दुर्भाग्यवश वे अपनी बात पर अड़े रहे । अंत में मेरा धैर्य जवाब दे गया और मैं उनसे लड़ बैठा।
बाद में मुझे महसूस हुआ कि  अगर मैं परेशान न होता तो शायद मैं धैर्य एवम वाकपटुता के साथ उन्हें इन्तज़ार करने के लिये मना लेता। यदि प्रारम्भ में ही मैं उन्हें अपनी मनःस्थिति के बारे में बता देता तो शायद वे उस दिन अनावश्यक दबाब न देते और अप्रियता टल जाती।  
एक बार मोटरसाइकिल से गिरने के कारण मेरे पाँव के घुटनों में हलकी चोटें आ गईं। मैं घर पर आराम कर रहा था, तभी मेरे मित्र राजीव जी ने फोन किया। मेरी बातों में गर्मजोशी नहीं थी और आवाज भी थकी-थकी थी। उन्होंने अविलंब ताड़ लिया कि मैं परेशान हूँ। मैंने उन्हें दुर्घटना के बारे में बताया तो वे मीठी झिड़की देने लगे," आपने पहले क्यों नहीं बताया ?" पहले पता हो जाता तो मैं आपसे अपने काम के बारे में आज बात नहीं करता।" राजीव जी की सलाह अमल करने लायक है।
  यदि आपकी मनःस्थिति किसी कारणवश  ठीक नहीं हो तो आप अपने दोस्तों और परिवार के सदस्यों को बता दें ताकि वे आपको आराम करने दें  और मानसिक सम्बल दें।  

Friday, December 19, 2014

अपने काम से काम रखिये।

कुछ  करने  की  इच्छा  रखने  वाले  व्यक्ति  के  लिए  इस  दुनिया  में  कुछ  भी  असंभव  नहीं  है  । 
अब्राहम  लिंकन । 
 जून 1989 में सबेरे 8 बजे मैं अपने मित्र श्री राम किशोर सिंह के  आवास पर एक आवश्यक कार्य-वश गया। उन्होंने सस्नेह मुझे बैठाकर चाय-नाश्ता कराया। मैं शिष्टाचारवश  उनका कुशल-क्षेम पूछने लगा। उन्होंने भी उत्सुकता से मेरे आने का कारण पूछा। मैंने बताया, "बस आपका हाल-चाल जानने आ गया हूँ।" इस पर  रामकिशोर बाबू  खुलकर हँसते हुए बोले, "उत्तम जी, आप अकारण अपनी गर्दन भी नहीं हिलाते हैं। " 
उनकी बात पर मैं भी अपनी हँसी रोक नहीं पाया। मैंने उन्हें अपने आने का सही उद्देश्य बताया। उन्होंने भी अविलम्ब मेरा काम कर दिया। 
मैं अपने अनेक  दोस्तों को व्यस्त पाता हूँ। वे कहते हैं, "मैं  काम में पूरी तरह से संलग्न हूँ। मैं पूछता हूँ, "क्या आप अपने काम में व्यस्त हैं या फिर दिल लगाने के लिए जो भी सामने है, उसे करते जा रहे हैं ?
 मेरा  प्रश्न सुनकर कई मित्र बगलें झाँकने लगते हैं। अंग्रेजी में एक कहावत भी है ," Busy for Nothing.".
कुछ  लोग तो " आये  थे  हरिभजन  को  ओटन  लागे  कपास " वाली  कहावत  चरितार्थ  कर  देते  हैं  अर्थात  जिस लक्ष्य  को  ध्यान  में  रखकर  कार्य  का शुभारम्भ करते  हैं, बाद  में  उसे  ही  मस्तिष्क से विस्मृत कर देते हैं। 
अनेक लोग कठोर परिश्र्म करके भी सफलता से कोसों दूर रह जाते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि महान अर्जुन की तरह चिड़िया की आँख पर केंद्रित नहीं रहती हैं।
अतः अपने कार्यालय में कोई भी काम करने के पहले अपने आप से पूछें कि क्या यह काम आपके जॉब प्रोफाइल के अंतर्गत है और क्या इसे करने से आपके उच्चाधिकारियों की कानून सम्मत अपेच्छाएं पूरी होंगी ? यदि जवाब "हाँ" हो तभी वह काम करें। अपने जीवन में कोई काम करने से पहले सोचें कि क्या यह कार्य आपको अपने जीवन के लक्ष्यों की ओर ले जायेगा ? यदि उत्तर नकारात्मक हो तो कृपया ऐसे कार्य को दूर से ही अलविदा कह दें।

रेलगाड़ी की तरह पटरी पर लगातार अपने लक्ष्यों की ओर चलते रहें। रास्ते में घना कोहरा आ सकता है या फिर आँधी आ सकती है। परिणामस्वरूप आपको अपनी गति धीमी करनी पड़ सकती है , लेकिन अपने लक्ष्यों की ओर दृढ़ता के साथ बढ़ते रहें। अनुकूल परिस्थितियों में गति तेज कर दें, प्रतिकूल परिस्थितियों में गति धीमी कर दें, लेकिन  निशाना वीर अर्जुन की तरह  हमेशा अपने लक्ष्यों पर  रखें। एक दिन सफलता अवश्य ही आपके क़दमों को चूमेगी।  

Friday, October 3, 2014

सस्ते में ईलाज कैसे करायें ?

दुर्भाग्यवश अनेक चिकित्सकों ने चिकित्सा को ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने का  साधन बना लिया है। वे अपना दवाखाना रखते हैं और ऐसी दवाइयाँ लिखते हैं जो सिर्फ उनके दवाखाने  में ही 
उपलब्ध होती  है। मैंने इन दवाइयों में मौजूद केमिकल वाले अन्य दवाइयों से  इनकी तुलना की  तो पाया कि लगभग/  हूबहू कॉम्बिनेशन वाली दवाइयाँ बाजार में काफी सस्ती मिलती हैं। अतः आप यदि बिना दवाखाना रखने वाले चिकित्सक से दिखाएंगे तो दवाइयों के मूल्य में आपको भारी बचत हो सकती है।
अनेक चिकित्सक बहुत ज्यादा जाँच लिखते हैं। उनके सहायक आपको किसी खास जाँच-घर में ही जाँच कराने की सलाह देते हैं।  ऐसे चिकित्सकों से भी यथा-संभव दूर रहें।
चिकित्सा-जगत में स्वर्गीय डॉक्टर शिवनारायण सिंह और डॉक्टर एस.एन जायसवाल  जैसे आदर्शवादी और योग्य चिकित्सक बहुत हैं। आप  ऐसे चिकित्सकों से इलाज कराकर खर्च  में भारी बचत कर सकते हैं। मेरे दोस्त-समबन्धी जब बीमार पडते हैं तो मैं उनका समाचार पूछने जाता हूँ। बातों ही बातों में उनसे इलाज करने वाले चिकित्सक का नाम और इलाज के दौरान उनके अनुभव के बारे में पूछता हूँ। इस तरह मेरे पास अपने शहर के सुयोग्य और कम जांंच एवं दवा लिखने वाले चिकित्सकों की सूची बन गयी है।
कुछ बीमारियों का इलाज सचमुच काफी खर्चीला होता है। ऐसी बिमारियों के चपेट में आने पर आपकी आर्थिक स्थिति चरमरा सकती है। अतः आप एक फ्लोटिंग मेडिक्लेम पालिसी ले सकते हैं जो एक विशेष राशि तक आपके परिवार के किसी भी सदस्य का चिकित्सा खर्च वहन कर सकता है। विस्तृत जानकारी आपको सम्बंधित इन्सुरेंस कंपनी के कागजात से  मिल सकती है। पंजाब नेशनल बैंक भी ओरिएण्टल इन्सुरेंस कंपनी के साथ टाई-अप करके  बहुत आकर्षक मेडिकलेम पालिसी बेचता है जिसमें आपके परिवार के चार सदस्यों को फ्लोटिंग मेडिक्लेम इन्सुरेंस दिया जाता है।
मैनें गूगल सर्च करने पर पाया कि मैनकाइंड फार्मा लिपिड प्रोफाइल कम करने की दवा LIPIKIND-F  4 रूपये 20 पैसे टेबलेट बेचती है, यही दवा कुछ कंपनी 15 रूपये टेबलेट बेचती है। इसी तरह इप्का की  LOSANORM २५, 2 रूपये प्रति टेबलेट से भी कम पर मिलती है जबकि इसी कैमिकल से बनी दवा के लिए कई कंपनियां 5 रूपये टेबलेट से भी ज्यादा एमआरपी रखी हैं।
अतः आप जागरूक रहकर अपने बटुए पर कम दबाब  देकर भी अपना इलाज करा सकते हैं। 

Sunday, September 21, 2014

बीमारियों में जड़ी-बूटियों का उपयोग, कितना उचित ?


मुझे मधुमेह हुआ तो मेरे अनेक शुभचिंतकों ने अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियों के बारे अवांछित सलाह दी। मेरे एक मित्र ने पूरे विश्वास के साथ भरोसा दिलाया कि बेल-पत्र की कोंपल मधुमेह पर जादू जैसा असर डालती है। चूँकि मूझे पता था कि बेल-पत्र की कोंपल का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है, अतः मैंने इसे आजमाया, मुझे तो मधुमेह में इससे कोई लाभ नहीं हुआ।

उपरोक्त विषय पर मेरे एक सम्बन्धी जो एम.बी.बी.एस., एम.डी. चिकित्सक हैं. उनका कहना है कि मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों में जड़ी-बूटियों के उपयोग से बचना चाहिए क्योंकि उनके गुण-दोषों को परखने के लिए कोई रिसर्च नहीं किया गया है . कुछ जड़ी-बूटियों के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं, जैसे कुछ लोग मानते हैं कि करैले का रस ज्यादा पीने से किडनियां फेल हो सकती हैं. यद्यपि इस पर शायद कोई रिसर्च नहीं हुआ होगा।

 एक बार मेरे एक मित्र ने मुझे बताया कि एक जड़ी-बूटी बेचने वाला घुटने के दर्द की राम-बाण दवा बेच रहा है। उस दुकान पर जाकर मैंने भी दवा खरीद ली।  दुकानदार दवा की तारीफ में एक से बढ़कर एक कशीदे काढ़ रहा था, लेकिन उसने दवा में प्रयुक्त जड़ी-बूटियों का नाम नहीं बताया और कहा कि यह ट्रेड-सेक्रेट है।  कुछ दिन दवा  खाने के बाद मेरा दर्द तो ठीक गया, लेकिन मैं अजीब नशे जैसी हालत में रहने लगा।  मेरे एक मित्र को जब यह पता चला तो उसने बताया कि वही दवा खाने के बाद उसके पिताजी के दोनों पैर चेहरा सहित सूज गए थे। चिकित्सक के सलाह पर दवा बन्द करते ही उनकी सूजन ठीक हो गयी।
मेरे अनुजतुल्य चन्द्रशेखर ने इस विषय पर अपना निम्नलिखित अनुभव बताया।
मै पत्नी के पैर दर्द की दवा मोतिहारी के एक नामी आयुर्वेदिक चिकित्सक से लेता था और दर्द शीघ्र  ठीक हो जाता था। अतः पत्नी भी खुश हो जाती थी और मै भी निश्चिन्त हो जाता था। एक दिन पत्नी ने बताया कि दवा लेने के बाद पैर दर्द तो चला जाता है पर पेट में दर्द होने लगता है। यह सुनकर मेरा माथा ठनका। मै इसके पीछे पड़ा तो पता चला कि इसमें पेन किलर के टेबलेट को पीसकर मिलाया जाता था। मै ढगा महसूश करने लगा। 
कभी भी आयुर्वेदिक दवा लोकल बनाया हुआ नहीं लेनी चाहिए। हमेशा ब्रांडेड कम्पनियों जैसे डाबर ,झंडू या पतंजलि का ही लेना चाहिए।
अतः फुटपाथ आदि पर जड़ी-बूटियां बेच रहे नीम-हकीमों के सब्ज-बाग मेँ आकर अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करें। यदि आयुर्वदिक दवा खाना चाहें तो मशहूर कंपनियों की दवायें शिक्षित आयुर्वेदिक चिकित्सक की देख-रेख में खाएं। मैनें दादी-नानी  के नुस्खों को भी एक सीमा तक लाभप्रद पाया है, इन्हें लेते समय कम से कम आपको इतना पता तो रहता ही है कि आप क्या ले रहे हैं ?


Monday, September 8, 2014

दूसरा विध्वंशकारी वाक्यांश " मैंने सोचा। "

 "मैंने सोचा" भी समय बर्बाद करने वाला, उपयोगहीन और विध्वंशकारी वाक्यांश है। हममें से अनेक न तो  कोई जांच करते हैं ना ही  अपनी नजरें चारों ओर दौड़ाते  हैं और बिना किसी ठोस आधार के कुछ भी सोचकर आगे बढ़ जाते हैं, और जब ठोकर लगती है तो अफ़सोस के साथ कहते हैं, "ओह ! मैंने क्या सोचा था, और क्या हो गया ? "
मैंने अपनी बाइक की चोरी के बारे में एक लेख," OVERCONFIDENCE KILLS " लिखा है।
  मैं अपनी बाइक हर जगह अच्छे तरीके से लॉक करके साईरन प्रणाली को ऑन कर देता था, लेकिन मैं अपने बैंक परिसर में साईरन प्रणाली ऑन नहीं करता था क्योंकि मैं सोचता था कि मैं शाखा प्रबंधक हूँ, मुझे और मेरे बाइक को इलाके के सारे लोग पहचानते हैं। अतः कोई भी चोर मेरे शाखा परिसर से मेरा बाइक चुराने का साहस नहीं करेगा, लेकिन अफ़सोस एक काले शनिवार क़ो जब मैं शाखा कार्यालय से बाहर निकला तो मेरे बाइक का कहीं अता-पता नहीं था। कोई शातिर  चोर उसे लेकर रफूचक्कर हो गया था। मुझे जोरदार सदमा लगा, जब एटीएम गार्ड मेरे बाइक का रंग भी ठीक से नहीं बता पाया। मेरी यह सोच कि पूरे इलाके के लोग मेरी बाइक को पहचानते हैं, पूरी तरह आधारहीन और काल्पनिक निकली। लेकिन शायद साईरन प्रणाली ऑन करने की परेशानी से बचने के लिए मैंने यह सोच लिया था की इलाके के सारे लोग मेरी बाइक पहचानते हैं।
एक शुभ मंगलवार को मेरी मेम साहब ने ऑफिस जाते समय मुझे टिफिन बॉक्स नहीं दिया बताया," आज आपके ऑफिस में पार्टी है, अतः टिफिन नहीं बनाया है। मैंने मुस्कराकर  कहा," मैंने पार्टी के बारे में बताया नहीं, आपने पूछा नहीं तो फिर आपने पार्टी की बात कैसे सोच ली ? मेम साहब रक्षात्मक अंदाज में बोलीं ,"आज आपके बैंक में विशेष दिन है न, इसलिये मैंने सोच लिया।" उस दिन सचमुच विशेष दिन था, लेकिन सामिष स्टाफ सदस्यों ने पार्टी अगले दिन शिफ्ट कर दी थी।  अतः मैंने मेम साहब को टिफिन बनाने से मना नहीं किया था, मेरी धर्मपत्नी ने भी इस बारे में कुछ नहीं पूछा और पार्टी की बात सोचकर लंच नहीं बनाया। शायद वो किसी और काम में व्यस्त होंगी और उस दिन लंच बनाना नहीं चाहती होंगी। अतः उनके अवचेतन मन ने  "मैंने सोचा " वाक्यांश का सहारा लिया होगा।  खैर मैंने भी मौके का फायदा उठाया और वंशी स्वीट्स में गरमा-गरम और लजीज पाव-भाजी का मजा लिया। यद्यपि मनोवैज्ञानिक मुझ पर भी आरोप लगा सकते हैं कि मेरा अवचेतन मन पाव-भाजी का मजा लेना चाहता था, इसलिए पार्टी के अगले दिन होने की बात मैंने अपनी मैडम को नहीं बताई। 
एक बार हमलोगों ने ऋण नहीं चुकाने वाले ऋणियों को नोटिस भेजा। एक सीधे-सादे ऋणी ने आकर कहा,"साहब, मैंने सोचा कि मेरा ऋण माफ़ हो गया है, इसलिए मैंने ऋण नहीं चुकाया। मैंने पूछा," आपको जब बैंक ने ऋण चुकता प्रमाण-पत्र नहीं दिया तो आपने ऐसा कैसे सोच लिया? " शायद वह ऋणी अपने सीमित आय से ऋण का मासिक किश्त चुकाना नहीं चाहता था, अतः उसने भी 'मैंने सोचा' वाक्यांश का सहारा लिया। परिणामस्वरूप ऋण की राशि बहुत ज्यादा हो गयी थी और वह मुकदमे  के डर से नींदविहीन रातें और चैनविहीन दिन बिता रहा था। 
अतः "मैंने सोचा" भी "बस एक बार" की तरह समय बर्बाद करने वाला, आधारहीन और बकवास भरा वाक्यांश है। अपना भविष्य उज्जवल बनाने के लिए सपने में भी इससे दूर भागें।

  

Sunday, September 7, 2014

तिसरा विध्वंशकरी वाक्यांश "चलता है"

 पहले हम दो  विध्वंशकारी  वाक्यांशों "बस एक बार" और "मैंने सोचा" के बारे में बता चुके हैं। आज हम तीसरे  विध्वंशकारी  वाक्यांश "चलता है" के बारे में विमर्श करेंगे। यह वाक्यांश पहले दोनों वाक्यांशों से भी ज्यादा हानिकारक है।
उपहार सिनेमा हादसा भारत की भीषणतम अग्नि दुर्घटनाओं में से एक था। चेतावनी दिए जाने के बावजूद भी सिनेमा हॉल के मालिकों ने सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किये । शायद उन्होंने सोचा होगा,"जैसा भी इंतजाम है, चलता है ". 
इस "चलता है" सोच के भयानक परिणाम हुए, भारत के अब तक के सबसे भयावह अग्नि-दुर्घटना में दम घुटने से  59 लोग असमय काल के गाल में समा गए और 103 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।   बाद में न्यायलय ने अंसल-बंधुओं समेत 12 लोगों को लापरवाही आदि  के अपराध का दोषी पाया और उन्हें कारावास तथा आर्थिक दंड की सजा सुनाई।  
एक बैंक में विश्वास (बदला हुआ  नाम)  नामक एक युवक काम करता था। वह बड़े ही मृदुल स्वभाव का आग्यांकारी स्टाफ था। बैंक अधिकारीयों का उस पर अटूट विश्वास था। 
बैंक में वह काफी दुर्भाग्यपूर्ण दिन था , जब बैंक के निरीक्षक ने लाखों रुपयों का घोटाला पकड़ा। यह घोटाला विश्वास ने कर दिया था।  सुंननेवालों को अपने कानों पर  विश्वास नहीं हुआ। विश्वास ने रोते -रोते बताया कि एक बार उसे कुछ सौ रुपयों की जरुरत थी। उसने खाते में गरबर करके रूपये निकाल लिए और बाद में जमा कर दिया। इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया। अतः उसने सोचा कि उसका तरीका चल गया। अतः जब उसे दुबारा कुछ ज्यादा रुपयों की जरुरत हुई तो उसने यही तरीका अपनाया और सोचा,"चलता है। " धीरे-धीरे उसकी जरूरतें बढ़ती गयीं और उसने काफी बड़े रकम का घोटाला कर दिया। अब उसके पास उतनी रकम नहीं थी कि वह खातों में डालकर गरबरी ठीक कर पाता। शाखा में निरीक्षण के दौरान गरबरी रह गयी और विश्वास पकड़ा गया। कल तक  जो चल रहा था, वह नहीं चल पाया और बेचारे की नौकरी चली गयी।
 2 G घोटाला करने वाले सोच रहे होंगे कि सब चलता है, अंततः वह घोटाला पकड़ा गया, अनेक लोग जांच के घेरे में है। अनेक लोगों को ज़मानत नहीं मिलने के कारण महीनों जेल में बितानी पड़ी।  यद्यपि कौन दोषी है और कौन निर्दोष ? इसका फैसला होना बाकी है। 
अतः आज जो चलता है, कल बड़े मुसीबत की जड़ बन सकता है। समय रहते इस वाक्यांश से तोबा कर लें। भले ही प्रारम्भ में आपको थोड़ा कष्ट होगा, लेकिन अंततः  आपका जीवन ज्यादा  सुखद और शांतिपूर्ण होगा।