Saturday, August 5, 2017

अच्छा आदमी क्यों बनें ?


नोबेल पुरस्कार विजेता श्री कैलास सत्यार्थी

क्यों गाँधी, टॉलस्टॉय,और लिंकन के नाम अभी भी आदर और श्रद्धा के साथ लिए जाते हैं? क्यों हिटलर, मुसोलिनी और दुर्योधन से लोग आज भी घृणा करते हैं?
क्यों सीता और राम की पूजा की जाती है जबकि रावण और मेघनाद के पुतले जलाये जाते हैं।
क्यों अधिकांश अपराधियों की अकाल मृत्यु होती है, जब कि  अच्छे लोग दीर्घायु होते हैं?
क्यों टाटा, बाटा और रिलायंस दिन-दूनी  रात चौगुनी गति से बढ़ते जाते हैं, जबकि अनेक ठग कम्पनियाँ प्रति वर्ष खुलती और बंद हो जाती हैं?
उपरोक्त सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है, अच्छाई की आज भी अर्चना और पूजा की जाती है। "काठ की हांड़ी चढ़ै न दूजे बार" एक शाश्वत सच्चाई है। 
आप अपने शहर और मुहल्ले में भी पायेंगे कि अच्छे लोग शांति और प्रतिष्ठा के साथ जीवन-यापन कर रहे हैं, जबकि चोर-उच्चके नींद में भी दहशत के साथ रहते हैं और असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं। 
अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है की अच्छा मनुष्य कैसे बनें और मान-सम्मान के साथ कैसे आत्मसंतुष्ट जीवनयापन करें और कर्म करने की क्षमता-वर्धन कर कैसे अपार सफलताएँ  पायें?
 महापुरुषों के जीवन-अध्ययन करने पर मैनें अच्छे व्यक्तियों में निम्नलिखित 3 महत्वपूर्ण गुण पाये। 

1. अपने साथ जुड़े व्यक्तियों, मित्रों और पारिवारिक सदस्यों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचायें। मुकेश अम्बानी जैसे लोग जो कम से कम मूल्य पर ज्यादा से ज्यादा लाभ दे रहे हैं, वे दिन दूनी रात चौगुनी गति से प्रगति कर रहे हैं।

2. अपने मित्रों, पारिवारिक सदस्यों और अपने-आप की यथा-सम्भव सहायता करें। यथाशक्ति अन्य जरुरतमन्दों की भी सहायता करें। आपकी अपनी सहायता आवश्यक है क्योंकि नियमित आहार, व्यायाम और उचीत जीवन-शैली अपनाकर आप स्वस्थ रहेंगे, तभी दूसरोँ की सहायता कर पायेंगे।
यदि आप कोई सहायता करने की स्थिति में नहीं हों तो अपनी उपस्थिति से उन्हें खुश और संतुष्ट रखने का प्रयास करें।

3. . ऐसा कोई कार्य न करें, जिससे किसी निर्दोष व्यक्ति या खुद को कोई कष्ट हो। आपकी आत्मा और आपका शरीर भी ईश्वर की अमानत है, अतः अपने साथ भी पूरा न्याय करें।


 अपराधी को सजा देने का कार्य सक्षम व्यक्ति पर छोड़ दें। 

 सारे प्रबंधन की पुस्तकों और व्यक्तित्व विकास  पुस्तकों में इन्हीं बिंदुओं को लागू करने के तरीके दिए गये हैं। जैसे:-  यह शिक्षा दी जाती है कि दूसरों की बात बीच में नहीं काटें। यदि आप बिंदु संख्या 3 का अभ्यास करेंगे तो कभी किसी की बात को बीच में नहीं काटेंगे क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें बुरा लगेगा। इस तरह कोई भी नैतिक शिक्षा इन तीन बिंदुओं के अंदर आ जाती है। दूसरों की बातें ध्यानपूर्वक सुनकर आप उनकी सहायता करेंगे या  उन्हें खुश और संतुष्ट करेंगे तो बिंदु संख्या 2 का अभ्यास कर लेंगे। यदि आप अच्छी ग्राहक सेवा देते हैं तो यह बिंदु संख्या 1 के अंतर्गत आ जाता है। सिर्फ ग्राहक से मुस्कराकर भी बात कर लेंगे तो बिंदु संख्या 2 का अभ्यास करते हुए अपने व्यापर की भी वृद्धि करेंगे। 
उपरोक्त तीन बिंदुओं का अभ्यास अधिकांश महापुरुष करते आ रहे हैं। इन तीन बिंदुओं का सतत अभ्यास अवश्य ही वांछित फल देगा और आपकी कार्य करने की क्षमता जितनी ज्यादा होगी, उतनी ही अपार सफलता आपके कदमों को चूमेगी।  जैसे श्री कैलास सत्यार्थी ने  1980 से लगातार बाल-मजदूरी उन्मूलन के लिए कार्य किया और 144 देशों में 83000 बच्चों को उनके अधिकार दिलवाये। परिणामस्वरूप उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार 2014 से सम्मानित किया गया।


Tuesday, March 7, 2017

MY PSYCHOLOGY BEHIND CUTTING MY PROFITS.

 In 2010, I bought a few hundred shares of Reliance Communication @ Rs. 185.00 per share, now they are trading at around Rs. 35. But I am keeping them close to my heart in the hope that they will regain their lost glory of Rs. 750 per share.
 I bought 50 shares of Tata Elxsi for Rs.225 per share and sold them @Rs. 550. Now they are trading at around Rs 1450, so I have been practicing opposite to the famous yore, " Run your profits and cut your losses."
When I am in profit, I book it due to the fear that the profit will evaporate. In the case of Tata Elxsi and Well Spun India, I booked profit in the hope that I shall buy them again at dips, but they never saw dips before multiplying many times. Once I bought 700 shares of Gammon India with the target of reaping 10 times profit. The price of shares doubled in a year but I DID NOT SELL THEM KEEPING IN VIEW TEN TIMES TARGET, BUT they came down slowly and now trading below my purchase price for 4 or 5 years.
The experienced exhort that sticking to any rule will not guarantee profits always but sticking to a good rule will give you profits most of the times.
 Should I watch, 200 days moving average i.e. purchasing a share when it goes above its 200 days moving average and selling it when it goes below its 200 DMA.
I request the experienced friends to guide me.

Tuesday, February 7, 2017

बताइये आप किस श्रेणी में हैं?

1.लाख समझाओ, कुछ नहीं करता है। इस कोटि के महामानव बिरले ही पाये जाते हैं, लेकिन लोग इन्हें देखकर दूर से ही सलाम कर देते हैं।

2. जितना बताओ, उतना ही करता है जैसे:-  मजदूर, रिक्शा-चालक, ऑटो-चालक आदि। ये लोग जीवन-पर्यन्त  कठोर परिश्रम करने के बावजूद निर्धन होते हैं।

3. जितना बताओ, उतना अच्छे से अच्छे तरीके से करता है।
अच्छी से अच्छी सेवा देने वाला व्यक्ति हर जगह ढूँढा  जाता है, अनेक बार हम दूसरी श्रेणी के दस चाय की दुकानों को छोड़कर किसी विशेष चाय की दुकान पर चाय पीने जाते हैं। इस श्रेणी के व्यक्ति काफी धन और यश कमा लेते हैं।

4. बिना किसी के बताये ही करने योग्य कार्य कर देता है। ऐसे व्यक्ति बहुत ज्यादा यश और धन कमा लेते हैं।

5. भविष्य के अवसरों को भाँपकर कार्य पहले ही प्रारम्भ कर देता है। मार्क जुकरबर्ग, धीरू भाई अम्बानी आदि इस श्रेणी में आते हैं। 

खुद जाँचिए आप किस श्रेणी में हैं ? 
कौन श्रेणी बेहतर है और 
बेहतर श्रेणी में आप कैसे जा सकते हैं?

Saturday, January 14, 2017

न रिवाल्वर ने मारा, न रंगदार ने मारा

उसे न तो रिवाल्वर ने मारा, न रंगदार ने मारा, उसे तो उसी के अति-आशावाद ने मार गिराया।

वह गोरा-चिट्टा और लम्बा युवक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था, तीक्ष्ण बुद्धि भी  था, तथा अपने माता-पिता का एकलौता पुत्र था। कोटा के एक अच्छे कोचिंग संस्थान में आई.आई.टी. प्रवेश-परीक्षा की तैयारी कर रहा था। सात सौ लड़कों के बैच में उसका रैंक लगभग चार सौ आया था। मुज़फ़्फ़रपुर लौटने हेतु उसकी टिकट कट चुकी थी।  बूढ़े माता-पिता बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रहे थे।
अचानक, वह लापता हो गया। छान-बीन  करने पर उसके कमरे से एक सुसाइड-नोट मिला जिसमें उसने अपने-आपको दोषी और स्वार्थी माना था और लिखा था कि वह अपने माँ-पिता को चम्बल नदी के मंझधार में मिलेगा। पुलिस ने  चम्बल नदी में जाल डालकर उस बेचारे का क्षत-विक्षत शव निकाला। अत्याचारी अवसाद एक बलि और ले चुका था।

अवसाद आस्तीन के सांप जैसा खतरनाक होता है।  आजकल भाग-दौड़ वाली दुनिया में गला-काट स्पर्धा है। अतः अनेक लोग मनचाही  सफ़लता नहीं मिलने पर अवसादग्रस्त हो जाते हैं।
 अतः अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों पर नजर रखें। साथ ही " कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचना।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि। 
 बार-बार जोर से दुहराते रहें ताकि इसे आपके साथ आपके इष्ट-मित्र भी सुनें और उनके मनो-मस्तिष्क पर इसकी अमिट छाप पड़ जाये।
कितना भी भयानक भूकम्प अचानक आ जाये, मजबूत सरिये से बना मकान बच जाता है, इसी तरह अत्यन्त  खतरनाक अवसाद का झोंका भी शक्तिशाली संस्कारों से बने मस्तिष्क पर हावी नहीं हो पाता है। यदि आप   शक्तिशाली  संस्कार बनाना चाहते हैं तो अच्छी बातें  बार-बार पढ़ते, बोलते और सुनते  रहिये।
सभी तरह के छुपे अवसादों की कारगर दवा है,"  कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचना।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि। "
अर्थात 
  कर्म करना हमारा अधिकार है, फल देना ईश्वर का अधिकार है और ईश्वर जो भी फल देंगे, उसे हम सहर्ष स्वीकार करेंगे और भविष्य में भी पूरी तन्मयता से कर्म करते रहेंगे।
 शांति, प्रेम, आनन्द। 

Monday, November 7, 2016

कौन थी वो जेबकतरी?

19 अगस्त, 2016 को मैं एक भीड़-भाड़ वाली जगह पर गया। वहाँ  अनेक स्थानों पर "पॉकेटमारों से सावधान "लिखा हुआ था ;रूटीन चेतावनी मानकर  मैंने इसपर ध्यान नहीं दिया। मेरी  धर्मपत्नी और छोटा सुपुत्र रौनक भी मेरे साथ था। मैं अपनी मैडम के पीछे-पीछे कतार में चल रहा था। तभी एक साँवली युवती  दूसरे कतार से मेरे पत्नी के पीछे चलने लगी। लड़की है, यह सोचकर मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया।  धीरे-धीरे अनेक युवतियाँ मेरे और मेरी अर्धांगिनी  के बीच में आ गयीं। रौनक मेरे ठीक पीछे था। रास्ते में थोड़ी दूर आगे मिनरल जल की बोतल दस रूपये प्रति बोतल की दर से बिक रहा था। मेरे और मेरी पत्नी के बीच की दो-तीन लड़कियाँ मिनरल जल खरीदने लगीं और साथ ही साथ हम लोगों की तरफ देख भी रही थीं।  दस रूपये बोतल मिनरल जल खरीदने का लोभ मैं भी सँवरण नहीं कर पाया। मैनें और रौनक ने एक-एक बोतल जल खरीदा।  इस  दौरान  हमारा  ध्यान  मैडम  पर  से  कुछ  समय  के  लिए  हट  गया। 

थोड़ी दूर आगे अब मेरी अर्धांगिनी अकेले चल रही थीं  और उनका हरा  हैंडबैग  उनके  दाहिने कन्धे से लटक रहा था ।  उनके पीछे की लड़कियां न जाने  कहाँ  उड़ गयी थीं।  रौनक ने अपनी  माताश्री  को रोका, फिर हम साथ चलने लगे। दर्शन करके हमलोग बाहर निकले। कैफ-कॉफ़ी हाउस में  गरमा -गरम  कॉफी  का  मजा  लेने के थोड़ी देर बाद हम लोगों ने स्वादिष्ट भोजन किया और होटल जाकर सो गए। उठने के बाद धर्मपत्नी ने किसी काम से अपना हैण्ड-बैग खोला तो उनका पर्स  लापता था। हमलोग फिर मन्दिर में गए। वहां के सुरक्षा अधिकारी के पास अनेकों खाली पर्स पड़े थे, लेकिन  उनमें हमारा पर्स नहीं मिला। 

बाद में इस दुर्घटना के बारे में विवेचना करने पर पाया कि मेरी यह सोच कि लड़कियाँ चोरी नहीं करेंगी और अगर इतनी भीड़ में कोई चोरी करेगा तो कोई न कोई देख ही लेगा ; गलत थी, जिस कारण हमलोग जेबकतरियों के गैंग के शिकार हो गए  और  उन्होंने  हैंडबैग  बड़ी  सफाई  से  खोलकर  पर्स  निकाल लिया  और  फिर  हैंडबैग  बन्द  भी  कर  दिया।  बाद  में  दुकानदारों  ने बताया  कि  वहाँ  ऐसे  निपुण  पॉकेटमार  हैं  जो  रास्ता  चलते  लोगों  का  पर्स  भी  बड़ी  सफाई  से  मार  देते  हैं।  एक  विशेष  बात  यह  भी  हुई थी  कि  वहाँ  मौजूद  अनेक  लोगों  ने  गेट  संख्या  2 से  दर्शन  करने  जाने  की  सलाह  दी  थी।  अतः  आप  जब  साईं  बाबा  के दर्शन  करने  शिरडी  जब  भी जाएँ  तो  अन्य  गेटों  से  दर्शन  करने  की  सम्भावना  पर  विचार  करें। 

अगले दिन हमलोग शनि मन्दिर में दर्शन करने गए।  दर्शन के बाद पत्नी एक पेड़ के नीचे  चबूतरे पर बैठी थी। तभी  स्मार्ट  कपड़ों  में एक अनजान खूबसूरत युवती आकर मेरी पत्नी के बगल में बैठ गई।  चूँकि मैं दूध का जला  था अतः मैनें मट्ठा भी फूँक-फूँक कर पीने की ठानी। मैं तुरत आकर वाइफ के सामने खड़ा होकर बात करने लगा। वह लड़की एक मिनट के अंदर उठकर चल दी। 

मेरे कई परिचित चलती ट्रेन में चोरों के शिकार हो चुके हैं। वे ऊपर वाली सीट पर सामान रखकर  बैठे थे। कुछ चोर ऊपर वाली सीट पर पालथी मारकर बैठ गए और समाचारपत्र पढ़ने लगे। इसी बीच न जाने कब वे सूटकेस का ताला खोलकर सारा कीमती सामान निकाल  कर  चम्पत  हो  गए।  यद्यपि उन्होंने यह अनुभव मेरी गृहणी का पर्स चोरी होने के बाद बताया। 

Friday, October 14, 2016

संक्रमण भगाएँ, स्वास्थ्य लाएँ

आपने मृत  पशु  अवश्य  देखा  होगा।  उसके  देहांत  के    बाद  अविलम्ब  दुर्गंध नहीं  फैलता है।  शव  जैसे-जैसे  सड़ता  है , हवा  में  बदबू  फैलने  लगती  है।  धीरे-धीरे   शव  सूखता  जाता है, एक समय ऐसा भी आता है, जब  शव  सूखकर  समाप्त  हो  जाता है। साथ  ही दुर्गंध भी समाप्त  हो जाता  है। 
 यक्ष -प्रश्न  यह है कि  शव  बिना  हटाये  कहाँ  चला  जाता  है। उसके बहुत  छोटे-छोटे  टुकड़े  अदृश्य बैक्टीरिया  में  परिणत होकर हवा  में  तैरते-तैरते समाप्त  हो  जाते  हैं। उधर  से  गुजरने  वालों  के  सम्पूर्ण  शरीर  को अदृश्य  बैक्टीरिया  दुष्प्रभावित करते रहते  हैं। 

अतः बदबूदार स्थानों पर बदबू होने का मुख्य कारण हवा में तैरते बैक्टीरिया होते हैं। अतः जब हम बदबूदार स्थानों पर जाते हैं तो हमारा पूरा शरीर हवा में तैरते इन बैक्टिरिया के बीच में चला जाता हैं। यह एक तरह से प्रदूषित हवा में डूबकी लगाने जैसा होता है। अतः यथासम्भव बदबूदार स्थानों से दूर रहने में ही भलाई है। यथासम्भव  समाज में या घर में भी दुर्गंध न पैदा होने दें।

मेरे मित्र का छः साल पहले किडनी प्रत्यर्पण हुआ। वे आज भी पूर्णतः स्वस्थ हैं। उन्होंने बताया कि किडनी प्रत्यर्पण के बाद चिकित्सक ने उन्हें संक्रमण से बचाव के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए।
1.सत्तर से अस्सी प्रतिशत मामलों में संक्रमण मल-मूत्र त्याग करते समय होता है। अतः वाश रूम हमेशा साफ-सुथरा रखें।


2. यात्रा करते समय फिनाइल अपने साथ रखें और सार्वजानिक शौचालयों में मल-मूत्र त्याग करने के पहले उसमें पानी मिलाकर शौचालय में डाल दें।


 रेल यात्रा के समय फेनाइल रखने का प्रयोग एक नयी क्रांति लाएगा।
 मेरे एक अन्य मित्र प्रमोद बाबू को को गन्दे शौचालय में मूत्र-त्याग के बाद संक्रमण हो गया था, बेचारे को अंततः पी.जी.आई. लखनऊ में  इलाज  कराना  पड़ा।  

Tuesday, October 11, 2016

याददाश्त देती है अक्सर धोखा

दुःशासन द्वारा चिरहरण के असफल प्रयास के पश्चात द्रौपदी ने प्रतिज्ञा किया कि  जब तक उसके  रुधिर से अपने बाल न धोएगी, तबतक  उन्हें  खुला रखेगी। अनिश्चित काल तक बाल खुले रखे बिना भी द्रौपदी यह कसम  खा सकती थी । यह  घोर अपमान पांडव भी भूलने वाले नहीं थे, फिर भी द्रौपदी अपने बाल खुले रखकर उन्हें हर पल  उस अपमान की याद दिलाती रहती थी, क्योंकि ईश्वर ने हमें क्षीण स्मरण-शक्ति दी है।  
कुछ  दिनों  पहले  मैंने  'अलकेमिस्ट ' तीसरी  बार  पढ़ी , लेकिन  लग  रहा  था , जैसे  कई  प्रसंग  बिलकुल  नए  हैं ?  बिरले  ही  कोई ठीक-ठीक  यह बता  पायेगा  कि  पिछले  सप्ताह  उन्होंने  किस  रंग की शर्ट -पैंट  पहनी  थी।  मेरे  एक मित्र ने  तो  यह  चुनौती  दे दी  कि  आप  यह  भी  नहीं  बता सकते  कि  दो  घण्टे  पहले  आप  किस  विचार  से  व्यथित  या  प्रसन्न  हो रहे  थे ?

एक बार मुझे २८ सितम्बर तक क्रेडिट-कार्ड के 6084 रूपये भरने थे। मैनें न तो इसे  To Do लिस्ट में लिखा और न ही कैलेंडर में  जोड़ा , क्योंकि मैं मानकर चल रहा था कि क्रेडिट-कार्ड का बकाया भूगतान करना, मैं भूल ही नहीं सकता। संयोगवश मैं बैंक की अर्धवार्षिक लेखाबंदी में व्यस्त था; इसी  बीच  28 सितम्बर  दबे  पाँव आया और चला गया। क्रेडिट-कार्ड वालों ने अच्छा-खासा जुर्माना ठोक दिया। मुझे 6084 रुपयों के बदले 6617 रूपये भरने  पड़े।  
अतः Repetition और Association से याददाश्त को सहायता करने के साथ-साथ  आप उन चीजों को व्यवस्थित ढंग से लिख भी लें। 
क्रेडिट-कार्ड कम्पनियाँ 50 दिनों तक ब्याज-मुक्त ऋण देकर भी मुनाफे में रहती हैं, शायद उन्हें मेरे जैसे भुलक्कड़ भारी संख्या में मिल जाते होंगे। 
मुझसे अनेक ग्राहक मिलते हैं, जिनकी लॉकर की चाभी या फिक्स्ड-डिपोजिट की रसीद  खो गयी रहती है, अगर किसी  विशेष  सामान को एक खास  स्थान  पर  रखने की आदत बनायें और परिवार के किसी जिम्मेदार सदस्य को भी यह जानकारी दे दें तो यह समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है और  बैंकों  में  बिना  किसी  दावेदार  के  पड़ी  अरबों  रुपयों  की  राशि में  भी  भारी  कमी  होगी। मैंने  तो लाखों  के  गहने  वाले  अनेक दावेदार विहीन लॉकर भी  देखे  हैं।  

Sunday, October 9, 2016

अकल तो चाहिए, नकल को भी

एक अस्पताल के बाहर घोंचू लाल  की कफ़न की दुकान थी।  दुकान काफी दिनों से मंदी चल रही थी। दीपावली का त्यौहार नजदीक था। घोंचू लाल अपने सुपुत्र पोंचू लाल के साथ चिंतित रहते थे कि दिवाली का पर्व बिना आमदनी के कैसे मनाएंगे ? 

इसी बीच धन-तेरस आ धमका।  घोंचू लाल ने अपने सुपुत्र को दस रूपये दिए और बोले," बेटा, कम से कम एक चम्मच ही खरीदकर सगुण कर लो। पोंचू लाल बाजार गए।  वहाँ  रात  में  भी  दिन  जैसा  माहौल था।  पूरा  बाजार  रौशनी  से  जगमगा  रहा  था।  बर्तनों और गहनों की एक से एक दुकानें सजी थी। एक दुकान पर भारी भीड़ लगी थी। वहां एक बड़ा बर्तन खरीदने पर छोटा बर्तन मुफ्त मिल रहा था। पोंचू लाल ने भी एक बड़े चम्मच के साथ एक छोटा चम्मच लिया और ख़ुशी-ख़ुशी लौट आये। 

अपनी दुकान पर पहुंचकर उन्होंने उपरोक्त स्कीम अपने पिताश्री को बताई।  बाप-बेटे को यह आईडिया हिट लगा। अगले दिन वे दोनों भी अपनी दुकान पर जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, " सेल-सेल ,महासेल !एक सयाने का के कफ़न के साथ बच्चे का कफ़न मुफ्त ले लो। "

देखते-देखते घोंचू और पोंचू की दुकान के चारों तरफ भीड़ लग गई। जिसके हाथ में जो भी आया, उसी से घोंचू और पोंचू को धोने लगा। जिनके  हाथ  में कुछ  नहीं  था , वे लप्पड़-झप्पड़  से  ही  काम  चला रहे थे। बाप-बेटे गिरते-पड़ते घर भागे। 

एक बात उन्हें आज तक समझ में नहीं आई कि जो स्कीम बर्तन-दुकान पर हिट थी, वही स्कीम  कफ़न - दुकान पर कैसे पिट गई?

अगर आपकी समझ में आये तो उन्हें जरूर बता दीजिएगे। 

Saturday, October 8, 2016

जिधर देखो उधर ही अवसर

 मैं खुद से जो सवाल हर दिन पूछता हूँ,क्या मैं वो सबसे ज़रूरी काम कर रहा हूँ जो मैं कर सकता हूँ?

             --- मार्क ज़ुकेरबर्ग



एक ब्राह्मण देवता एक सम्पन्न  गाँव में रहते थे। उनके पास एक काले रंग की घोड़ी थी जिसपर  वे जान छिड़कते  थे और उसपर ही सवार होकर जजमानों के यहाँ जाते थे। एक दिन वे घोड़ी लेकर  पूरब की ओर निकले। उसका मन उस दिन आराम करने का था। अतः वह बेमन से धीरे-धीरे चल रही थी। पंडित जी को गुस्सा आया और उन्होंने घोड़ी को जोर से चाबुक मारा। घोड़ी जोर से हिनहिनाई और पूरब के बदले पश्चिम की ओर दौड़ने लगी। पण्डित जी जोर से चिल्लाये ," कोई बात नइखे ससुरो, उधरो  दो-चार जजमान बा"

आशावादी और उत्साही लोग कहते हैं,"रुपया आसमान में उड़ रहा हैं , उसे देखने के लिए प्रशिक्षित आँखें  चाहिए और पकड़ने के लिए निपुण हाथ चाहिए। "

एक मूर्तिकार  ने अवसर की प्रतिमा बनाई थी , जिसके सिर के आगे बाल थे और पीछे गंजा था, अतः अवसर को वही पकड़ सकता है, जो उसके आने के पहले पूरी तरह तैयार रहता है। 

मार्क जुकरबर्ग ने  कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर में बचपन से प्रशिक्षण और रूचि लिया। 4 फरवरी, 2004 को उन्होंने हार्वर्ड के अपने डॉरमिटरी से फेसबुक लॉंच किया और आज  संसार के चौथे सबसे अमीर आदमी हैं।  

Sunday, October 2, 2016

कल्पना में कंजूसी क्यों ?

एक बार एक व्यक्ति दायें हाथ में रोटी लेकर बायीं हथेली में सटाकर खा रहा था। उसके साथी को यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ। साथी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा," भाई, तेरी बाँयी हथेली खाली है, फिर तू बार-बार  रोटी बायीं हथेली में सटाकर क्यों खा रहे हो ? उस व्यक्ति ने बड़ा दुःखद उत्तर दिया," मैं कल्पना कर रहा हूँ कि मेरी बायीं हथेली में नमक है और मैं नमक के साथ रोटी खा रहा हूँ। " उसके साथी को बड़ा सदमा लगा, साथी ने माथा ठोकते हुए कहा," मुर्ख! अगर तुझे कल्पना ही करनी है तो कल्पना कर कि तेरी बायीं हथेली पर मलाई है और तू मलाई-रोटी खा रहा है। 

अगर परिवार का कोई भी व्यक्ति घर आने में देर करता था तो माँ घबराने लगती थी और उनके मन में बुरे ख्याल आने लगते थे। एक बार पिताजी देरी से आये , माँ  घबराई हुई थी ; उनके  मन में  भयानक  विचार  आ  रहे थे जब कि पिताजी होली की खरीददारी करने में व्यस्त थे। 
मिथिला  में  अनेक श्रद्धालुओं  की  मान्यता  है  कि  इच्छा  देवी  हर  पल  विचरण  करती  रहती  हैं , वे  जिधर  भी  जाती  हैं , लोगों  की  इच्छाएं  पूरी  कर  देती  हैं।  अतः जो जैसा  सोचता और  बोलता  है , वैसा  ही  पाता  है।  प्रसिद्ध लोकप्रिय कहावत  "मंशे  फल  नियते  बरक्कत " भी  इस  धारणा  की  पुष्टि  करती  है। 

अत जब कल्पना ही करनी है तो अच्छी कल्पनाएं करें, आप जैसी कल्पना करेंगे, वैसा ही परिणाम आपको मिलेगा क्योंकि हर पल अपना दुःख रोने वालों के पास दुखों का पहाड़ आता हैं और सकारात्मक सोच रखने वालों और सकारत्मक बातें करने वालों के जीवन में अच्छी बातें होती रहती हैँ। 
अगर आपको मेरी बात पर विश्वास नहीँ हो तो अपने कार्यालय, परिवार या मुहल्ले में  दोनों  प्रकार  के  पांच या दस लोगों की सूची बनाकर आप खुद परख सकते हैं।  

Sunday, April 10, 2016

TELL 'NO' WHILE IN HASTE

Unreasonable haste is the direct road to error.
                                                          --- Moliere.

 Once robbers shot at my one staff member, I rushed to the emergency ward of Patna Medical College and Hospital to look after him. My wife called there to inform that an acquaintance was asking for our car. I allowed after initial hesitation, but alas! Next day, the car was returned in a terrible condition.

I was searching a good engineering college for my son. One of my friends was also worried about his daughter's admission. He informed me one day about an engineering college and asked expectantly,"Whether I, too, wanted to jump on the bandwagon." I asked for a little time to consider the pros and cons, but he coaxed me to fire, " Yes or no" immediately since the cunning broker was insisting on a  quick decision. I said yes to find later on that the college was useless. Even my friend rejected that rotten college. But,  in the meanwhile, we coughed out a few thousand bucks.

The ploy of a cheater is to force you to decide quickly; don't fall prey to it and take sufficient time for exploring all alternatives even by making alibis.  The author of 'Rich Dad Poor Dad,' Robert Kiyosaki advocated taking time for consulting your business partner, although it may be your cat.
 Always fire an emphatic, unequivocal and polite 'NO,' if anybody forces you to reply immediately.
 You may say yes anytime after telling 'NO' without losing your credibility. But once you reply in affirmative, it is too tough to say 'NO' later and keep your credibility intact. 
 Hasty decisions are often wrong. Therefore, by avoiding quick decisions,  you will save yourself from losses most of the times.